आज भी ब्रिटिश हुकूमत की समयबद्धता की याद दिलाते हैं ये घंटे

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भूपेश कन्नौजिया, मुक्तेश्वर। नैनीताल जिले का छोटा सा पर्यटक स्थल मुक्तेश्वर अंग्रेजों की देन है। डा.अल्फ्रेड लिंगार्ड नामक एक अंग्रेज ने इसकी खोज की और अनुसन्धान कार्यों के लिए इसको चुना। धीरे-धीरे आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान) अस्तित्व में आया और अनुसंधान कार्य की नयी गाथा लिखते चला गया। खैर हम बात कर रहे …

भूपेश कन्नौजिया, मुक्तेश्वर। नैनीताल जिले का छोटा सा पर्यटक स्थल मुक्तेश्वर अंग्रेजों की देन है। डा.अल्फ्रेड लिंगार्ड नामक एक अंग्रेज ने इसकी खोज की और अनुसन्धान कार्यों के लिए इसको चुना। धीरे-धीरे आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान) अस्तित्व में आया और अनुसंधान कार्य की नयी गाथा लिखते चला गया।

खैर हम बात कर रहे हैं यहां स्थित ब्रिटिश शासन काल की समयबद्धता की और आज भी हर रोज ठीक उसी तरह इस्तेमाल किये जाते हैं जिस तरह आज़ादी से पहले किये जाते थे,यहां एक छोटा घंटा जो मुख्य कार्यालय पर लगा है सुबह 9:30 बजे एक लंबी ध्वनि के साथ बजाया जाता है जिसका सिग्नल होता है की अब कार्यालय मे कार्य आरम्भ करने का समय हो चुका है। उसके बाद आता है अभियांत्रिक अनुभाग के पास एक चट्टान पर बने घंटाघर रुपी और बेहद जानदार आवाज वाला घंटा जो सुबह नौ बजे ,शाम चार बजे और फिर रात्रि दस बजे से सुबह 6 बजे तक हर घंटे बजाया जाता था लेकिन फिलहाल यह घंटा अभी खराब है जिसके सुधार के लिए प्रयास भी किए जा रहे हैं।

यहां तैनात सिक्योरिटी गार्ड इसे नियमित रूप से बजाते थे लेकिन इसके खराब होने की वजह से आजकल इसकी आवाज गुम है।  इसके बाद आता है एक खास सबसे बड़ा घंटा जो की कैंपस के अंदर संस्थान के प्रभारी परिसर के आवास के निकट स्थित है और काफी अरसे से बंद होने के बावजूद अडिग खड़ा है यहां निवासरत स्थानीय निवासी बताते हैं की ब्रिटिश शासनकाल मे जब मुक्तेश्वर या इसके आस पास के जंगल मे कहीं भयंकर आग लग जाती थी या अन्य कोई बड़ी घटना घट जाती थी तो उस वक़्त इस घंटे को बजा  अल्मोड़ा में तैनात फायर ब्रिगेड पुलिस को संकेत दिया जाता था और उसी वक़्त पूरी तैयारियों के साथ अल्मोड़ा से टीम पैदल और घोड़ों के सहारे मुक्तेश्वर तक पहुंचते थे , फिलहाल ये घंटे आज भी ब्रिटिश सल्तनत की यादें ताजा कर रहे हैं और यहां आने वाले लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं। बता दें अंग्रेज जहां भी गए उन्होंने समयबद्धता के लिए ऐसे घंटो का निर्माण करवाया जिन्हें गौंग टावर के नाम से जाना जाता है।

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