ब्रिटिश कालीन भवनों में आज भी नजर आते हैं “लाइटनिंग अरेस्टर”  

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हल्द्वानी। आकाशीय बिजली से पहाड़ी भवनों को सुरक्षित रखने के लिए अंग्रेजों ने प्रत्येक भवन की छत पर एक खास यंंत्र लगवाना अनिवार्य किया था। जो आज भी पहाड़ के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों नैनीताल,मुक्तेश्वर और रानीखेत सहित अन्य पहाड़ी क्षेत्रों के भवन की छतों पर आपको देखने को मिल जाएंगे। अब भी तमाम बिल्डर …

हल्द्वानी। आकाशीय बिजली से पहाड़ी भवनों को सुरक्षित रखने के लिए अंग्रेजों ने प्रत्येक भवन की छत पर एक खास यंंत्र लगवाना अनिवार्य किया था। जो आज भी पहाड़ के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों नैनीताल,मुक्तेश्वर और रानीखेत सहित अन्य पहाड़ी क्षेत्रों के भवन की छतों पर आपको देखने को मिल जाएंगे। अब भी तमाम बिल्डर इस प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं और लोगों को जागरुक करने का प्रयास भी।

आकाशीय बिजली से भवन को सुरक्षित रखने के लिए जिस यंत्र की बात कर रहे हैं उसे दरअसल “लाइटनिंग अरेस्टर” या तड़ित चालक कहा जाता है यानी बिजली को अपने आप में समाने वाला। फिलहाल आपको बताते चलें की ये ब्रिटिशकालीन लाइटनिंग अरेस्टर आज भी अपना कार्य सुचारू रूप से कर रहे हैं , अष्ट धातु से निर्मित एक मोटा गोला और उस पर तीन से सात तक की नुकीली छड़ें एक लंबे लोहे के छड के सहारे खड़े भवन की चिमनियों पर लगे आसानी से आपको नजर आ जायेंगे और उसी के सहारे घर की दीवार से लगी तार की एक मोटी पट्टी जो जमीन के अंदर दाखिल होती है इन भवनो को सुरक्षित रखती है।

इसी टेक्नोलॉजी को अब बाहरी बिल्डर भी अपना रहे हैं और तांबा ,लोहे और एल्युमीनियम से तैयार करवा रहे हैं, एक बिल्डर की मानें तो तांबे से निर्मित अरेस्टर को बनवाने में तकरीबन चालीस हजार तक का खर्च का जाता है। लेकिन जो बात ब्रिटिश कालीन अरेस्टर में दिखती है वह फर भी नहीं आ पाती। आपको बताते चलें की मुक्तेश्वर में ब्रिटिश कालीन भवनों में लगे इन अरेस्टर को 100 वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर यहाँ भवनों में लगे अरेस्टर आज भी अपना कार्य सुचारू रूप से कर रहे हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि यह काम कैसे करता है तो चलिए अधिक जानकारी के लिए आपको मुक्तेश्वर स्थित आईवीआरआई में कार्यरत अभियंता मुकुल तिरूवा के पास।

 मुकुल तिरूवा,अभियंता आईवीआरआई मुक्तेश्वर – आकाशीय बिजली कई हज़ार वोल्ट मे होती है जो प्रायः पेड़ों , ऊंचे भवनों पर ही गिरती है इसकी वजह ये होती है की ऐसी जगहों पर बिजली का अवरोध कम होता है और आसानी से आकाश से जमीन की तरफ खींची चली आती है , जमीन का पोटेंशियल जीरो होता है जो आकाश से जमीन की तरफ खींचता है , आकाशीय बिजली हमेशा नुकीली चीजों की तरफ ज्यादा आकर्षित होती है ,मुक्तेश्वर में देवदार के जंगल ज्यादा हैं  इसी के चलते अंग्रेजों ने ये लाइटनिंग अरेस्टर भवनों पर लगाये ताकि आसपास के भवनों को कोई नुकसान न हो , ये लाइटनिंग अरेस्टर कॉपर (तांबे) , अष्ट धातु व लोहे के बने होते हैं ।

इनमे नुकीली छड़ों का प्रयोग बिजली को आसानी से अपने अंदर समाने के लिए किया जाता है उसके बाद तांबे की एक मोटी पट्टी से जोड़ भवन की दीवार के सहारे जमीन के अंदर तकरीबन छह से बारह फुट की गहरायी तक ले जाकर 2×2 फिट की व 6एमएम की  एक प्लेट जो लोहे की होती है उसे नमक,कोयला मिला जमीन से अर्थ उपलब्ध करवाई जाती है ,नमक का प्रयोग जमीन के अंदर नमी बनाये रखने व कोयले का प्रयोग पानी की आसानी से प्लेट तक पानी उपलब्ध करवाने के लिए किया जाता है क्योंकि कोयला पानी रोकता नहीं और निकास कर जल आसानी से जमीन के अंदर पंहुचा देता है कोयले और पानी का मिश्रण जमीन के अंदर परत दर परत किया जाता है ,जब कभी किसी भवन पर आकाशीय बिजली का कहर बरपता है तो तो तुरंत नुकीली छडें अपनी तरफ बिजली को खींचती हैं और तांबे की पट्टी से होते हुए बिजली जमीन मे समा जाती है और लोगों की जान बच जाती है साथ ही भवन भी सुरक्षित रहता है । आज भी लोग घरों ,बड़ी इमारतों पर इन्हें लगवाते हैं जो काफी लाभप्रद होता हैं। 

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