जेब पर बढ़ता बोझ
हाल के कुछ समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पिछले पखवाड़े से यह वृद्धि इतनी बढ़ गई कि आम आदमी परेशान हो चला है। हर दिन बढ़ती कीमतों की वजह से दिल्ली में पेट्रोल 90.58 रुपये प्रति लीटर पर चला गया। डीजल भी 80.97 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया। …
हाल के कुछ समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पिछले पखवाड़े से यह वृद्धि इतनी बढ़ गई कि आम आदमी परेशान हो चला है। हर दिन बढ़ती कीमतों की वजह से दिल्ली में पेट्रोल 90.58 रुपये प्रति लीटर पर चला गया। डीजल भी 80.97 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया।
राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के पार हो गई हैं। निश्चित ही यह निम्न और मध्यमवर्गीय लोगों की जेब पर लगातार बढ़ता भारी बोझ है। डीजल के दाम बढ़ने से किसानों के सामने समस्या आ रही है। कृषि पर किसानों की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
सवाल यह है कि पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि कैसे थमे? केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक कार्यक्रम में कहा है कि इस पर केंद्र और राज्य सरकारें ही रास्ता निकाल सकती हैं। वजह यह है कि देश में पेट्रोल की खुदरा कीमतों में 60 फीसदी और डीजल की कीमतों में करीब 56 फीसदी हिस्सा केंद्र और राज्य करों का है।
जािहर है कि पेट्रोल और डीजल पर यदि केंद्र और राज्य सरकारें अपने करों को कम करें तो निश्चित ही मूल्य वृद्धि पर रोकथाम संभव है। जैसा कि केंद्रीय वित्तमंत्री ने कहा कि पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य के कर बराबर हैं। केंद्र और राज्य अगर यह तय कर लें कि कोई एक कर हटा दे तो कीमत में अच्छी छूट मिल सकती है।
अलबत्ता, मूल्य वृद्धि के पीछे दूसरा कारण है- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होना। वैसे, कच्चे तेल में कीमतों पर उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है। यह हमेशा चलता रहता है, जिसके आधार पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बढ़ाया और घटाया जाता रहता है लेकिन केंद्र और राज्य के करों ने पेट्रोलियम पदार्थों को सबसे ज्यादा महंगा किया है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार अपनी आर्थिक स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए जो कर जनता पर थोपतीं हैं, उनमें पेट्रोल और डीजल पर लगाए जाने वाले कर भी कम नहीं हैं। चूंकि पेट्रोल और डीजल की खपत बहुत है इसलिए कर के रूप में केंद्र और राज्य सरकारों को इनसे अच्छी-खासी आय होती है लेकिन क्या यह उचित है कि जनता पर इस कदर बोझ डाला जाए कि उसका जीना दुश्वार हो जाए।
एक तो वैसे ही बढ़ती महंगाई से जनता परेशान है। सब्जी से लेकर आम जरूरतों की हर चीज महंगी होती जा रही है। कोरोना काल के बाद लोगों की आय में भी कमी आई है। बहुत सारे लोगों से रोजगार-धंधे छिने हैं। इससे वे अभी तक उबर नहीं पाए हैं। ऐसे में, केंद्र और राज्य सरकारों को आपस में सामंजस्य स्थापित कर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित करने का रास्ता िनकालना चाहिए।
