योजनाओं का सच

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Edited By Amrit Vichar
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उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने बजट में बहुत सारी योजनाओं का खाका खींचा है और उसके लिए अच्छे-खासे बजट का इंतजाम कर दिया है। अच्छी बात है। बजट की यही परंपरा रही है। इसमें योजनाओं का स्वरूप तय होता है और उसके लिए बजट का निर्धारण कर दिया जाता है। कई नई योजनाओं का स्वरूप …

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने बजट में बहुत सारी योजनाओं का खाका खींचा है और उसके लिए अच्छे-खासे बजट का इंतजाम कर दिया है। अच्छी बात है। बजट की यही परंपरा रही है। इसमें योजनाओं का स्वरूप तय होता है और उसके लिए बजट का निर्धारण कर दिया जाता है। कई नई योजनाओं का स्वरूप भी तय कर उनकी रणनीित पेश की जाती है और बाद में पूरे वित्तीय वर्ष में उन योजनाओं पर काम चलता है और उसके लिए समय-समय पर बजट का धन भेजा जाता है लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है कि बजट में तय सभी योजनाओं को अमलीजामा पहना दिया गया हो। कारण है कि बजट में तय योजनाओं पर जमीनी स्तर पर काम नहीं हो पाता। योजनाएं इसलिए अधूरी रह जाती हैं क्योंकि उनको कार्यान्वित करने वाली सरकारी मशीनरी उतनी चुस्त-दुरुस्त नहीं होती कि वह किसी भी योजना पर समयबद्ध कार्य कर पाए।

निश्चित ही आज हमारी सरकारी मशीनरी में कई खामियां हैं। ऊपर से योजनाएं तो बनती हैं,उनके लिए बजट भी जारी होता है लेकिन धरातल पर सरकरी तंत्र उसको उतार नहीं पाता। गांव-गरीब तक आते-आते यह योजनाएं दम तोड़ जाती हैं। बहुत सारे योजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं और कई कागजी खानापूरी में ही निपटा दी जाती हैं।

सरकार जो दावे करती है वे धरातल के बजाय कागजी आंकड़ों पर आधारित होते हैं, जमीनी हकीकत से दूर। मसलन, गरीबों के लिए आवास तो बने दिखाए जाते हैं लेकिन धरातल पर देखेंगे तो आधे-अधूरे ही बने होंगे। जािहर है कि आधे-अधूरे बने मकानों में कौन रहेगा? यही स्थिति शौचालयों के निर्माण में होती है।

बजट पेश करते समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सारे गांवों को डिजिटल करने की घोषणा की है। शायद, पहले भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ऐसी घोषणा कर चुके हैं लेकिन कितने गांव अब तक डििजटल हुए? यह किसी से छुपा नहीं है। नि:स्संदेह योजनाएं और उनका स्वरूप अच्छा लगता है लेकिन जब तक वे जमीन पर खरी नहीं उतरतीं या तो वास्तविक लाभािर्थयों तक नहीं पहुंचतीं, तब तक उनको बनाने या उन पर बेहिसाब पैसा बहाने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

सरकार को दूसरे और सबसे अहम पहलू पर गौर करना ही चाहिए। वह योजनाएं बनाती है और उसके लिए पैसा देती है तो यह देखने की भी उसकी जिम्मेदारी है कि जनता के लिए एक-एक पैसे का उपयोग हो। अगर योजनाएं धरातल पर उतरती हैं तभी उनकी सार्थकता है, अन्यथा नहीं। जब तक वास्तविक जरूरतमंदों को योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, तब तक सरकार के सभी अच्छे दावे सही नहीं हो सकेंगे, इसलिए सरकार मजबूत सरकारी तंत्र विकसित करे।