…जब आदि अंत रहित एक भीषण अग्निस्तम्भ के रूप में प्रकट हुए भोलेनाथ, जानिए क्यों मनाते हैं शिवरात्रि

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शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा व विष्णु मे इस बात पर विवाद हो गया कि दोनों मे श्रेष्ठ कौन है। विवाद बढने पर दोनों के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया। समस्त देवता इस भीषण युद्ध को देखने के लिए एकत्र हो गये। इस युद्ध के मध्य विष्णु ने माहेश्वर अस्त्र का प्रयोग किया जिसके …

शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा व विष्णु मे इस बात पर विवाद हो गया कि दोनों मे श्रेष्ठ कौन है। विवाद बढने पर दोनों के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया। समस्त देवता इस भीषण युद्ध को देखने के लिए एकत्र हो गये। इस युद्ध के मध्य विष्णु ने माहेश्वर अस्त्र का प्रयोग किया जिसके प्रतिकार में ब्रह्मा ने पाशुपत अस्त्र चलाया। असमय प्रलय आती देखकर सभी देवता भागकर भगवान शिव के पास गुहार लगाने कैलाश पर्वत पहुंचे। भगवान शिव इस युद्ध के बारे में पहले से अवगत थे। देवताओं को आश्वस्त कर वे तत्काल युद्ध स्थल पर पहुंचे और स्थिति को देखते हुए विष्णु और ब्रह्मा के बीच मे निष्कल जोकि उनका निराकार स्वरूप है, आदि अंत रहित एक भीषण अग्निस्तम्भ के रूप में प्रकट हो गए।

                                                                 महानलस्तम्भविभीषणाकृति
                                                                 र्बभूव तन्मध्यतले स निष्कल।।

देखते ही देखते इन दोनों के द्वारा चलाए गए माहेश्वर अस्त्र व पाशुपत अस्त्र उस अग्निस्तंभ में विलीन हो गए। इस घटना से आश्चर्यचकित होकर दोनों ने तय किया कि यह पता लगाया जाए कि इस भीषण अग्निस्तंभ का आदि और अंत कहां है। अग्निस्तंभ का मूल पता करने के लिए वाराह अवतार विष्णु पाताल लोक की ओर और हंस आरूढ़ ब्रह्मा आकाश मार्ग में खोज करने लगे। काफी दूर तक जाने के बाद पाताल लोक में अग्निस्तंभ का कोई आदि न मिलने के कारण थक हार कर विष्णु युद्धस्थल पर लौट आए। ब्रह्मा जोकि आकाश मार्ग से अग्निस्तंभ के शीर्ष का पता लगाने के लिए निकले थे को रास्ते में एक अम्लान अद्भुत केतकी पुष्प ऊपर से आता दिखाई दिया।

उन्होंने केतकी पुष्प को अपना परिचय देकर इस बात के लिए सहमत कर लिया कि केतकी विष्णु के समक्ष इस बात का साक्ष्य देगा कि ब्रह्मा अग्निस्तंभ के शीर्ष तक पहुंचे थे और वहीं से वह दोनों आ रहे हैं। वहां से ब्रह्मा व केतकी पुष्प युद्धस्थल पर पहुंचे जहां पर विष्णु पहले से ही मौजूद थे। ब्रह्मा ने विष्णु को बताया कि वे इस अग्निस्तंभ के शीर्ष तक जाकर वापस हुए हैं और यह केतकी पुष्प इसके साक्षी हैं। केतकी ने ब्रह्मा की बात का समर्थन किया। विष्णु ने इस आधार पर ब्रह्मा की श्रेष्ठता स्वीकार कर उन्हें अभिवादन किया।

ब्रह्मा व केतकी पुष्प के इस असत्य आचरण से क्षुब्ध होकर भगवान शिव अपने निष्कल निराकार स्वरूप अग्निस्तंभ से स्वयं साकार रूप में प्रकट हुए। उन्होंने विष्णु को अपने समान सम्मान व पद प्रदान किया तथा ब्रह्मा को मारने के लिए भैरव को उत्पन्न किया। अनुनय विनय व प्रार्थना करने पर उन्होंने ब्रह्मा को लांछित करके क्षमा किया तथा केतकी पुष्प को देवताओं के पूजन से बहिष्कृत कर दिया। इसके पश्चात ब्रह्मा और विष्णु ने विधिपूर्वक भगवान शिव की स्तुति की। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कहा कि

                                                             दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरं
                                                             शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया।।

आज का दिन एक महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगों पर बहुत प्रसन्न हूं। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान से महान होगा। आज की यह तिथि शिवरात्रि के नाम से विख्यात होकर मेरे लिए परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरी पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि का कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।

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