बेपटरी कानून व्यवस्था

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Edited By Amrit Vichar
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हाथरस में बेटी से छेड़छाड़ का मुकदमा वापस न लेने वाले पिता की आरोपी द्वारा गोली मारकर हत्या कर देने की घटना बेहद दुस्साहसिक और कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली है। इस घटना को अंजाम देने वाले आरोपी गौरव शर्मा की कानून का कोई खौफ न होने की सोच को समझा जा सकता है। …

हाथरस में बेटी से छेड़छाड़ का मुकदमा वापस न लेने वाले पिता की आरोपी द्वारा गोली मारकर हत्या कर देने की घटना बेहद दुस्साहसिक और कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली है। इस घटना को अंजाम देने वाले आरोपी गौरव शर्मा की कानून का कोई खौफ न होने की सोच को समझा जा सकता है।

विचारणीय है कि भला आज सभ्य समाज में कोई ऐसा कैसे कर सकता है कि अपने पुराने जुर्म को खत्म करने के लिए दुबारा उससे भी बड़ा जुर्म कर बैठे। यह तो चोरी की चोरी और सीनाजोरी वाली कहावत चरितार्थ होती है, उस पर तब जब मौजूदा सरकार अपने शासनकाल में कानून का राज होने की बात बार-बार करे।

उस पिता ने क्या अपनी बेटी से छेड़छाड़ करने वाले पर मुकदमा दर्ज कराकर गुनाह कर दिया था? क्या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना गुनाह है? नहीं तो फिर क्यों उस पिता को कानून की शरण लेने पर आरोपी की ओर से मौत की सजा दी गई? आरोपी कितना दबंग है और पुलिस और कानून का उसको कोई खौफ नहीं रह गया।

फिल्मों में इस तरह की दबंगई देखने को मिलती है लेकिन यह घटना उसी तर्ज पर प्रत्यक्ष अंजाम दी गई। अब यूपी की सरकार भले ही आरोपी पर एनएसए की कार्रवाई कराए और कानून उसको सजा दे लेकिन इस घटना ने कई सवाल समाज के बीच खड़े कर दिए हैं? आखिर आम आदमी कहां और किससे न्याय की उम्मीद करे? उस पुलिस से क्या न्याय की उम्मीद की जा सकती है जो पीिड़त को संरक्षण नहीं दे सकती।

कोई भी सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करे और अधिकारी कागजी घोड़े दौड़ाकर सबकुछ अच्छा-अच्छा दिखाएं लेकिन सच यह है कि थानों में आम आदमी को न्याय नहीं मिलता। यह भी सच है कि आम आदमी पुलिस थानों में न्याय मिलने की उम्मीद भी नहीं करता। थानों से गरीब आदमी को भगा दिया जाता है।

कोई कार्रवाई कराने की उसकी मांग पर उससे तरह-तरह के सवाल होते हैं। मुकदमा दर्ज हो भी जाए तो मुकदमों की विवेचना पुलिस की सुस्ती में ही महीनों उलझी रहती है। यदि आरोपी भारी पड़ गया तो कब मुकदमे में फाइनल रिपोर्ट लग जाए, वादी को पता ही नहीं लगता। जब पुलिस का यह हाल हो तो फिर कानून व्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है।

यूपी में अगर पुलिस का खौफ होता तो शायद हाथरस में बेटी का पिता आरोपी के हाथों मौत के घाट नहीं उतारा जाता। बेहतर यही है कि सरकार पुलिस तंत्र को पहले व्यवहारिक तौर पर चुस्त-दुरुस्त करे, उसके बाद ही कानून व्यवस्था बेहतर होने का दावा करे।