आरक्षण पर पुनर्विचार

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Edited By Amrit Vichar
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आरक्षण का मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में है। इस बार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आरक्षण की 50 फीसदी सीमा पर विचार करेगी। प्रसंग है- मराठा आरक्षण का, जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में महाराठों को सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा बताते हुए शिक्षा और नौकरी में 12 से 13 फीसद आरक्षण दिया …

आरक्षण का मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में है। इस बार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आरक्षण की 50 फीसदी सीमा पर विचार करेगी। प्रसंग है- मराठा आरक्षण का, जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में महाराठों को सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा बताते हुए शिक्षा और नौकरी में 12 से 13 फीसद आरक्षण दिया है। चूंकि यह पहले से दिए 50 प्रतिशत आरक्षण से अतरिक्त है इसीिलए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

अब इस बहाने सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ संविधान के 102 वें संशोधन से राज्यों का पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के लिए कानून बनाने के अधिकार पर विचार करेगी कि राज्यों को आरक्षण की तय 50 प्रतिशत की सीमा को भंग करने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं? इसीिलए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शािसत प्रदेशों को नोटिस जारी करके इस पर सवाल किया है।

गौरतलब है कि सन 1992 में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मंडल जजमेंट के नाम से मशहूर इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण की अधिकतम 50 फीसद सीमा तय की थी, साथ ही यह भी कहा था कि अपवाद में सीमा लांघी जा सकती है, लेकिन वह दूरदराज के मामलों में होनी चाहिए।

अब चूंकि मराठा आरक्षण मामले में तय सीमा लांघी गई है इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमा के निर्धारण पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ 15 मार्च से प्रतिदिन सुनवाई करेगी। आरक्षण का मुद्दा वर्षों से उठता रहा है। अफसोस यह है कि इसका राजनीतिक इस्तेमाल भी खूब किया गया है। वोटों की राजनीति के लिए सत्ताधारी दल समीकरण साधते हुए आरक्षण को अपने मुताबिक परिभाषित और आवंटित करते आए हैं। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण इसकी ही नजीर है।

उत्तर प्रदेश में भी कई पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की कवायद न सिर्फ मौजूदा सरकार में बल्कि पूर्ववर्ती समाजवादी और बसपा सरकार में भी की गई है। बहुत सारे संगठन तो लंबे समय से आरक्षण को खत्म करने की ही मांग उठाते आए हैं। उनकी यह मांग अभी भी जारी है।

निस्संदेह आरक्षण ने बहुत सारी जातियों को नौकरियों और शिक्षा में लाभ पहुंचाया है और बहुत सारे लोग इससे वंचित भी हैं इसलिए वे इसके पक्ष में नहीं हैं। सरकार और शीर्ष कोर्ट को इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि आरक्षण का सिर्फ राजनीतिकरण ही होकर न रह जाए बल्कि हर उस वर्ग को, जिसे वास्तव में आरक्षण की आवश्यकता है, उसे इसका लाभ मिलना चाहिए।