महिलाओं की भागीदारी
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का आगाज होने जा रहा है। एक बार फिर से पंचायत चुनाव में महिलाओं को समुचित भागीदारी देने के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष, सदस्य, ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और ग्राम पंचायत सदस्य के पदों पर आरक्षण का प्रावधान किया जा रहा है। अच्छी बात है कि महिलाओं को आरक्षण …
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का आगाज होने जा रहा है। एक बार फिर से पंचायत चुनाव में महिलाओं को समुचित भागीदारी देने के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष, सदस्य, ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और ग्राम पंचायत सदस्य के पदों पर आरक्षण का प्रावधान किया जा रहा है।
अच्छी बात है कि महिलाओं को आरक्षण के जरिए सही पंचायत की बागडोर मिलती है लेकिन वास्तविकता किसी से छुपी नहीं है कि अधिकांश मामलों में उनका यह प्रतिनिधित्व सिर्फ नाम के लिए होता है। असल में तो जिला पंचायत अध्यक्ष और ग्राम प्रधान की कुर्सी पर बैठने वाली महिलाओं के कार्य तो उनके घर के पुरुष सदस्य, जिनमें पति, बेटे या भाई आदि ही चलाते हैं। कई जिलों में इसके उदाहरण देखने को मिलते हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक तरफ तो हम महिला सशक्तिकरण की बात करने हैं लेकिन महिलाओं को ही उनके अधिकारों से वंचित कर देते हैं। पंचायत प्रतिनिधि बनकर भी महिलाएं अपने विवेक से न तो कोई निर्णय ले पाती हैं, न ही कोई कार्य कर पाती हैं। सारे काम महिला प्रतिनिधियों के नाम पर खेल उनके परिवार के पुरुष सदस्य ही करते हैं लेकिन कार्रवाई की दशा में इसका खमियाजा महिला प्रतिनिधियों को भुगतना पड़ता है।
दरअसल, यहां पुरुषवादी सोच महिलाओं को अपने विवेक से निर्णय लेने में खुद के कमतर आंकती है। कुछ अपवाद को छोड़ दें तो पंचायतों की बैठकों में महिला प्रतिनिधि चुप्पी साधे ही बैठी रहती हैं। ऐसे में, सवाल यह उठता है कि आखिर यह पंचायत का कैसा लोकतंत्र है, जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि को कोई अधिकार नहीं होता। आखिर यह कब तक चलेगा।
महिलाओं को काम करने का मौका पंचायत में कब तक मिल पाएगा? यह अहम सवाल है। क्यों नहीं हम उनको स्वेच्छा से निर्णय लेने देते? जब यह स्थिति है तो फिर कैसे हम कह सकते हैं कि महिलाओं को पंचायत में भागदारी मिल पा रही है। यह भागीदारी सिर्फ नाम की ही है तो फिर इसका मतलब क्या रह जाता है इसलिए बेहतर है कि महिलाओं के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान ही न किया जाए। इन सवालों पर गहन मंथन करने की आवश्यकता है।
शासन को चाहिए कि यदि वह वास्तव में महिलाओं को लोकतंत्र में सहभागी बनाना चाहती है तो व्यवस्था का ऐसा मॉडल विकसित करें जिससे कि ग्राम प्रधान और जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे पदों पर निर्वाचित होने वाली महिलाएं अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के हस्तक्षेप से बाहर आकर स्वेच्छा और स्वविवेक से कार्य कर पाएं, तभी लोकतंत्र और महिला अधिकारों की सार्थकता होगी।
