बरेली: ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रहा हेपेटाइटिस का प्रकोप

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शिवांग पांडेय, बरेली। लिवर सिरोसिस और लीवर कैंसर का कारण बनने वाली हेपेटाइटिस सी बीमारी से जागरूक न होने के कारण अक्सर आमजन समय पर इलाज नहीं कराते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक, अनदेखी पर लिवर फेल्योर या कैंसर तक की नौबत आ जाती है, फिर मरीज की जान पर बन आती है। यह बीमारी इसलिए …

शिवांग पांडेय, बरेली। लिवर सिरोसिस और लीवर कैंसर का कारण बनने वाली हेपेटाइटिस सी बीमारी से जागरूक न होने के कारण अक्सर आमजन समय पर इलाज नहीं कराते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक, अनदेखी पर लिवर फेल्योर या कैंसर तक की नौबत आ जाती है, फिर मरीज की जान पर बन आती है।

यह बीमारी इसलिए बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि आधे से ज्यादा संक्रमित लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें इसके लक्षण या तो दिखाई नहीं देते या फिर सामने आने में ही दस साल तक लग जाते हैं। इसलिए चिकित्सक समय-समय पर रक्त की जांच कराने का सुझाव देते हैं।

एडीएसआईसी और जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. सुबोध शर्मा ने बताया कि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन तब फैलता है जब वायरस खून को संक्रमित कर फैलना शुरू कर देता है। इस वायरस के सात रूप हैं और सातों के 67 प्रकार हैं। मरीज को कौन सी दवा देनी है या इलाज का तरीका क्या होगा, यह वायरस के रूप पर निर्भर करता है। जिला प्रतिरक्षण अधिकारी ने बताया कि बहेड़ी के आस-पास के इलाकों में ये बीमारी चरम पर है, जिसके लिए स्वास्थ्य विभाग रैंडम सैंपलिंग कर नियंत्रित कर रहा है।

एक से डेढ़ लाख तक इलाज का खर्च
जिला अस्पताल में अब तक इस बीमारी का इलाज या दवा आदि उपलब्ध नहीं थी। कुछ निजी अस्पतालों में ही इलाज हो रहा था। संक्रमण के शरीर में फैलने के आधार पर तीन से छह माह तक चलने वाले दवा के कोर्स पर ही करीब एक से दो लाख रुपये खर्च हो जाते हैं।

जिले के सभी सरकारी अस्पतालों में हेपेटाइटिस सी बीमारी का इलाज मुफ्त मिलने से मरीजों को सहूलियत मिली है। तीन महीने के इलाज के दौरान मरीजों को हर तरह की दवाइयां अस्पताल से मुफ्त मिलती है। केवल जांच का खर्च मरीजों को उठाना होगा, लेकिन वह खर्च भी अधिक नहीं होगा। जांच के तौर पर करवाए जाने वाले टेस्ट भी सब्सिडी पर होंगे। इसके लिए जिले के दो लैबों के साथ टाईअप किया गया है। इन लैबों में कम रेटों में टेस्ट होंगे।

इम्यूनोसप्रैसिव दवा से होता है इलाज
वरिष्ठ फिजिशियन डा. आरके गुप्ता के मुताबिक, हेपेटाइटिस-सी संक्रमित खून से फैलता है। असुरक्षित यौन संबंधों के अलावा संक्रमित खून चढ़ने, संक्रमित उस्तरा से दाढ़ी बनवाने, मुंडन करवाने और संक्रमित नीडल के इस्तेमाल से होता है। यह रोग अभी तक लाइलाज रहा मगर अब प्रतिरोधक क्षमता कम करने वाली (इम्यूनोसप्रैसिव) दवाओं के जरिये वायरस को शरीर से बाहर करते हैं। हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन है, लेकिन संक्रमण हो जाने के बाद रोगी को ताउम्र इसे दबाने की दवा खानी पड़ती है। इसलिए सतर्कता जरूरी है।

हर माह 100 मरीजों को जिला अस्पताल में मिल रहा हेपेटाइटिस का इलाज
खून से फैलने वाली लीवर की बीमारी हेपेटाइटिस-सी की गिरफ्त में आए लोगों को अब जिला अस्पताल में मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। कोरोना काल में शासन ने जिला अस्पताल में दवा भेजी गई थी। अस्पताल प्रशासन के अनुसार बरेली के अलावा मंडल के अन्य जिलों के मरीज भी यहां से निशुल्क दवा उपलब्ध कराई जाती है।

पिछले दस सालों में बढ़े मरीज
जिला अस्पताल ब्लड बैंक प्रभारी डा. यूवी सिंह ने बताया कि किसी भी डोनर का ब्लड लेने के बाद उसकी जांच की जाती है। करीब दो फीसद डोनर के खून की जांच में हेपेटाइटिस बी का वायरस पाया जाता है। उसके खून को हटा देते हैं और संबंधित व्यक्ति को इलाज कराने को बता दिया जाता है। पिछले दस सालों में बीमारी बढ़ी है। स्वस्थ लोगों में भी वायरस मिल रहा है। स्वस्थ लोगों में भी वायरस मिलने पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से बच्चों का हो रहा नियमित टीकाकरण कराकर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा रही है।

हेपेटाइटिस बी का टीका उनके नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल है। पहला टीका बच्चे को जन्म के 24 घंटे में लगा दिया जाता है। फिर डेढ़, ढाई और साढ़े तीन माह में बच्चों को डोज लगाई जाती है। जिले में जहां भी टीकाकरण बचा है, वहां अभियान चलाकर बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं। वहीं, जिला अस्पताल में मरीजों का निशुल्क इलाज भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
डा. एसके गर्ग, मुख्य चिकित्सा अधिकारी

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