आरक्षण के पार

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Edited By Amrit Vichar
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सुप्रीम कोर्ट की यह बात अहम है कि राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए आरक्षण के इतर और भी कदम उठाने चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना करनी चाहिए, क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने मराठा आरक्षण के मामले की सुनवाई के …

सुप्रीम कोर्ट की यह बात अहम है कि राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए आरक्षण के इतर और भी कदम उठाने चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना करनी चाहिए, क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने मराठा आरक्षण के मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही।

सुप्रीम कोर्ट का यह कथन बिल्कुल सही है कि पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए हमें आरक्षण के पार जाना होगा। दरअसल, देश में आरक्षण अब बड़ा मुद्दा बन चुका है। राजनीतिक हितों के लिए राज्य सरकारों ने आरक्षण को मनमाने ढंग से बढ़ाया है। सुप्रीम कोर्ट से 1992 में तय की गई पिछड़ा वर्ग के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण की सीमा को भी वोट बैंक की राजनीति के लिए बढ़ा दिया गया।

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के लिए भी वहां की राज्य सरकार ने इसी मानक को तोड़ा तो मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से पूछा था कि क्या 50 प्रतिशत तक तय की सीमा को बढ़ाया जा सकता है? अभी राज्यों को इस मामले में जवाब देना है लेकिन इस बीच सोमवार को मराठा आरक्षण मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के पार भी पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए बहुत कुछ किए जाने का सुझाव दिया।

नि:स्संदेह आरक्षण दबे-कुचले और पिछड़े वर्गों के लिए एक जरूरत थी। देश की आजादी के बीच इसीलिए संविधान में इसका प्रावधान किया गया और अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्गों की जातियों के लिए आरक्षण प्रदान किया गया। उनको शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का लाभ भी मिला, लेकिन जब इस आरक्षण का राजनीतिकरण होने लगे तो सवाल लाजिमी हो जाते हैं। इसी राजनीतिकरण ने आरक्षण की तय अवधि को कभी पूरा नहीं होने दिया।

हालांकि इसके सामाजिक कारण भी हैं, आज भी बहुत सारे लोगों को आरक्षण की जरूरत है। उनको जो सामािजक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं लेकिन जब इसका दोहन होने लगे तो इस पर विचार किया जाना ही सामाजिक और देशा हित में होगा। वजह यह है कि बहुत सारे लोग, जो आज आरक्षण के सहारे आगे बढ़ चुके हैं उनको क्या उसके बाद भी आरक्षण की आवश्यकता है?

बात आरक्षण की मंशा को समझने की है। आरक्षण की मंशा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान की है। ऐसे में, जो इस दायरे में आते हैं, उनको आरक्षण दिया जाना चाहिए लेकिन सिर्फ जाति को ही आरक्षण का आधार मानते रहेंगे तो क्या उचित है? इस पर मंथन की जरूरत है, इसीलिए राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का सुझाव प्रासंगिक और अहम है।