कोरोना से बढ़ी मुश्किलें
केंद्र सरकार ने 2020 में महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ पैकेज की घोषणा की थी। भारत इस महामारी को हराने के करीब था, लेकिन ब्रिटेन और अन्य देशों से फैले नए प्रकार के वायरस की वजह से स्थिति अब काफी मुश्किल हो गई है। देश में कोरोना के …
केंद्र सरकार ने 2020 में महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ पैकेज की घोषणा की थी। भारत इस महामारी को हराने के करीब था, लेकिन ब्रिटेन और अन्य देशों से फैले नए प्रकार के वायरस की वजह से स्थिति अब काफी मुश्किल हो गई है। देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। साथ ही संक्रमण से मौतों का आंकड़ा भी ऊपर जा रहा है।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार कहते हैं कि कोविड की दूसरी लहर से सेवा जैसे कुछ क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ेगा। दूसरी लहर से आर्थिक वातावतरण को लेकर भी अनिश्चितता पैदा होगी, जिसका आर्थिक गतिविधियों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। आधिकारिक अनुमान के अनुसार, 2020-21 में अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की गिरावट आएगी।
फिलहाल कोरोना संकट से अस्त-व्यस्त जिंदगी में आम लोगों की आमदनी में गिरावट आई है और क्रय शक्ति घटी है। लगातार बढ़ती महंगाई कष्टप्रद है। यह महंगाई केवल पेट्रोल-डीजल व ईंधन के दामों में ही नहीं, खाद्य पदार्थों व फल-सब्जियों में भी नजर आ रही है। वैसे तो लोग पहले ही महंगाई की मार झेल रहे थे, लेकिन अब हाल में आए थोक महंगाई के आंकड़ों ने उस पर मोहर लगा दी है। चिंता की बात यह है कि देश में थोक महंगाई दर बीते आठ सालों के मुकाबले उच्चतम स्तर पर जा पहुंची है। खाद्य वस्तुओं में ही नहीं, फल व सब्जियों के दामों में भी।
आमतौर पर देश में मौसम के चरम यानी गर्मी की तेजी के साथ ही कीमतों में उछाल देखा जाता है जो अब की बार अप्रैल में ही नजर आने लगा। सरकार को मुश्किल वक्त में महंगाई की इस छलांग के कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। ऐसे में सरकारी नीतियों में संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद की जाती है। वैसे सरकार की तरफ से कोई गंभीर प्रयास महंगाई पर काबू पाने के लिए नहीं किए गए। यहां तक कि केंद्रीय बैंक की नीतियां भी महंगाई को उर्वरा भूमि देती रही।
दरअसल, कोरोना संकट के मुकाबले के लिए बीते साल देश में जो सख्त लॉकडाउन लगा, उसका देशव्यापी प्रभाव नजर आया। अर्थव्यवस्था ने तेजी से गोता लगाया। ऐसे में दिसंबर के बाद के दो महीनों में अर्थव्यवस्था जब पटरी पर लौटती नजर आई तो सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को गति देने की थी, न कि महंगाई रोकने की। ऐसे में सरकार से महंगाई नियंत्रण की दिशा में संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद की जानी चाहिए। सरकार के साथ ही केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीतियों में बदलाव भी मददगार हो सकता है। साथ ही जमाखोरों पर नियंत्रण लगाना जरूरी है। अन्यथा टुकड़ों-टुकड़ों में लगने वाला लॉकडाउन और महंगाई मारक साबित हो सकती है।
