फिर वही संकट

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Edited By Amrit Vichar
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कोरोना के मामलों में लगातार हो रही वृद्धि के बीच देश के अलग-अलग इलाकों से प्रवासी श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। प्रवासी श्रमिकों को रात्रि कर्फ्यू के साथ-साथ तमाम बंदिशों के अलावा संभावित लॉकडाउन की आशंका भी सता रही है। शहरों में रहकर काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों के काम-काज पर …

कोरोना के मामलों में लगातार हो रही वृद्धि के बीच देश के अलग-अलग इलाकों से प्रवासी श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। प्रवासी श्रमिकों को रात्रि कर्फ्यू के साथ-साथ तमाम बंदिशों के अलावा संभावित लॉकडाउन की आशंका भी सता रही है। शहरों में रहकर काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों के काम-काज पर कोरोना की दूसरी लहर का उल्टा असर पड़ने लगा है। उन्हें लॉकडाउन का डर सता रहा है। प्रवासियों का कहना है कि गांव में रहकर उन्हें रोजी-रोटी की चिता नहीं होगी और संक्रमण से भी बचेंगे।

हालांकि मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन को रोकने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। पिछले साल जैसी घबराहट की स्थिति को रोकने के लिए केंद्र व राज्यों की सरकारें पलायन को रोकने के लिए विस्तृत योजना पर काम कर रही है। सरकारें चाहती है कि गत वर्ष जैसी स्थिति फिर से न हो। इसलिए पलायन रोकना जरुरी है, श्रमिकों की सेहत और औद्योगिक उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। श्रमिकों को अफवाहों से सावधान पहने के लिए सचेत किया जा रहा है।

ध्यान देना चाहिए कि प्रवासी श्रमिक दोहरे संकट में हैं। एक तो जिस रोजगार की तलाश में वे शहरों में आए थे, वह छूटता नजर आ रहा है, वहीं संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। मजबूरी में अपने बच्चों को इस असुरक्षित वातावरण में लेकर जा रहे हैं। चिंता इस बात की है कि राजनेताओं के आग्रह के बावजूद वे रुकने को तैयार नहीं हैं, उन्हें डर सता रहा है कि यदि लॉकडाउन लंबा खिंचा तो फिर वे कहीं पिछले साल की तरह दाने-दाने के लिये मोहताज न हो जाएं। उन्होंने दिल्ली में छह दिन के लॉकडाउन लगाने पर मुख्यमंत्री की उस अपील पर भी ध्यान नहीं दिया, जिसमें सरकार ने उनके खाने, रहने, टीकाकरण और सुरक्षा की व्यवस्था करने का वादा किया।

अच्छी बात यह है कि इस बार बसें व ट्रेनें चल रही हैं। इसके बावजूद श्रमिकों से वाहन चालकों द्वारा ज्यादा किराया वसूलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। राज्य सरकारों को अपने घरों को लौट रहे इन मजदूरों की कोरोना जांच, खाने-पीने और पुनर्वास पर गंभीरता से विचार करना होगा ताकि उनका दुख-दर्द और न बढ़े।

सामाजिक रूप से भी यह विडंबना है कि जिन शहरों का जीवन संवारने के लिये ये मजदूर घर-बार छोड़कर आते हैं, उस शहर का समाज भी इनके प्रति संवेदनशील नहीं होता। प्रधानमंत्री ने बीते साल लोगों से मकानों के किराये को टालने और सेवायोजकों से वेतन न काटने की अपील की थी। लेकिन न तो समाज इनकी मदद के लिये आगे आया, न मकान मालिक ने रहमदिली दिखाई और न ही सेवायोजक ने वेतन काटने में कोई संवेदनशीलता दिखाई।