बरेली: कोरोना काल में सरसों तेल भी हो गया महंगा
बरेली, अमृत विचार। लाॅकडाउन का भय दिखाकर दुकानदारों ने बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ा दिए हैं। वहीं सरसों की जमाखोरी का फायदा उठाया जा रहा है। 2019-20 में 3200 रुपये क्विंटल में बिकने वाली सरसों अब 7300 रुपये क्विंटल तक बिक रही है। यही कारण है 80 रुपये किलो वाला सरसों का तेल …
बरेली, अमृत विचार। लाॅकडाउन का भय दिखाकर दुकानदारों ने बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ा दिए हैं। वहीं सरसों की जमाखोरी का फायदा उठाया जा रहा है। 2019-20 में 3200 रुपये क्विंटल में बिकने वाली सरसों अब 7300 रुपये क्विंटल तक बिक रही है। यही कारण है 80 रुपये किलो वाला सरसों का तेल दो साल में 150 रुपये किलो तक पहुंच गया है।
गल्ला मंडी की बात करें तो यहां साल में सरसों आवक बहुत कम होती है। सरसों खरीदने का क्रय केंद्र नहीं है। जो फसल आती है उसे नीलामी से बेचते हैं। विगत दिनों पहले 7300 रुपये क्विंटल तक सरसों की नीलामी लग चुकी है। मौजूदा समय में सरसों 6800 रुपये क्विंटल के हिसाब से बिकी। इस पर जीएसटी और मंडी शुल्क अलग से लगता है। यही वजह है कि सरसों की आवक मंडी में कम हो रही है। क्योंकि किसानों से व्यापारियों ने सीधे फसल खरीदना प्रारंभ कर दिया है। यहां मंडी शुल्क से 100-200 रुपये अधिक देकर फसल खरीदी जाती है तो जीएसटी और मंडी शुल्क बच जाता है।
वहीं किसानों को हाथों हाथ रकम मिलती है तो सहूलियत के लिए वह भी सीधे फसल बेच देते हैं । ऐसे में थोड़ी बहुत फसल मंडी में पहुंचती है तो नीलामी में उसकी बोली अधिक लग जाती है। यहां नीलामी में फसल अधिक महंगी बिकती है तो बाजार में भी वही भाव स्थिर हो जाते हैं। इधर, कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकार बताते हैं बाजार में डिमांड नहीं है। फसल की पैदावार अच्छी और क्षेत्रफल अच्छा खासा है। कुल मिलाकर कुछ व्यापारियों ने फसल की जमाखोरी कर ली तो बाजार में सरसों पहुंच नहीं रही है। इसलिए सरसों का तेल महंगा बिक रहा है।
सरसों का तेल महंगा होने का यह है गणित
शहर के प्रतिष्ठित कारोबारी ने बताया कि मंडियों में 6800 से लेकर 7100 रुपये क्विंटल के हिसाब से सरसों की फसल बिक रही है। इस पर छह प्रतिशत जीएसटी और एक प्रतिशत मंडी शुल्क अलग से लगता है। अगर एक क्विंटल सरसों की फसल का तेल निकाला जाए तो 33 किलो तेल निकलता है। दो किलो खल जल जाती है। ऐसे में 65 किलो खल बचती है।
थोक के रेट में 160 रुपये किलो तेल बिक रहा है। इस हिसाब से 33 किलो तेल की कीमत 5280 रुपये बनती है। वहीं 65 किलो खल 30 रुपये किलो के हिसाब से 1950 रुपये का बिक रहा है। पेराई 250 रुपये क्विंटल है। जबकि लोडिंग-अनलोडिंग में पांच रुपये किलो का चार्ज लग जाता है। ट्रांसपोर्ट का खर्च अलग से है। यही वजह है कि बाजार में सरसों का तेल महंगा बिक रहा है। कोरोना संक्रमण से पहले 2020 में यही फसल 3200 रुपये क्विंटल बिक रही थी। फुटकर में तो सरसों का तेल 180 रुपये किलो तक बिक रहा है।
पिछले साल कमजोर फसल थी महंगाई का कारण
प्रगतिशील किसान सर्वेश कुमार ने बताया कि पिछले साल फसल का दाना कमजोर हो गया था। ऐसे में एक क्विंटल सरसों में बमुश्किल 15 किलो तेल निकला था। कम फसल होने की वजह से मांग बढ़ी। सरसों का तेल भी कम निकला तो महंगाई हो गई। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। कुछ जमाखोरों ने सरसों के तेल को महंगा करने का खेल रचा है। कहीं कोई तेजी नहीं है, मांग भी नहीं है। केवल फसल जमाखोरी के चलते फसल मंडी नहीं पहुंच रही है। थोड़ी बहुत पहुंचती है तो नीलामी महंगी हो जाती है। प्रशासन को जमाखोरों पर शिकंजा कसना होगा।
