बरेली: संक्रमित प्रियजनों के महंगे इलाज ने कर्ज में डुबोया
बरेली, अमृत विचार। कोरोना में आर्थिक तौर से कमजोर गरीब परिवारों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। लोगों को संक्रमित परिजनों के इलाज में लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। बेहतर इलाज के चक्कर में लोग कर्ज तले दबे जा रहे हैं वहीं सदस्य की मृत्यु हो जाने पर पीड़ित परिवार की हिम्मत …
बरेली, अमृत विचार। कोरोना में आर्थिक तौर से कमजोर गरीब परिवारों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। लोगों को संक्रमित परिजनों के इलाज में लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। बेहतर इलाज के चक्कर में लोग कर्ज तले दबे जा रहे हैं वहीं सदस्य की मृत्यु हो जाने पर पीड़ित परिवार की हिम्मत दोहरी मार से टूट जाती है।
कोरोना संक्रमित किसी व्यक्ति की यदि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो उसे निजी अस्पतालों का बेहद खर्चीला इलाज उठा पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। मरीज को आईसीयू में रखने के लिए एक दिन का खर्च ही 15 से 20 हजार रुपये है। इसके अलावा दवाईयों सहित तमाम दूसरे खर्चे होने के बाद परिजनों को कई लाख रुपये भरने पड़ते हैं। आर्थिक तौर से कमजोर परिवारों के सामने पूरा इलाज कराने के लिए कर्ज और अपनी संपत्ति तक बेचनी की मजबूरी खड़ी हो जाती है।
बताते हैं कि कोविड का इलाज कराने वाले बड़ी संख्या में गरीब परिवार कर्ज के बोझ के तले दब चुके हैं। इसमें तमाम ऐसे परिवार भी हैं जो मोटी रकम खर्च करके भी अपने प्रियजन की जान नहीं बचा सके हैं। ऐसे में उन्हें दोहरा दुख झेलना पड़ रहा है और ऐसे में पीड़ित परिवारों की हिम्मत भी टूट रही है। इस समय लॉकडाउन से रोजगार व काम-धंधे सभी प्रभावित हैं। ऐसे में खर्च हुई मोटी रकम की भरपाई कर पाना भी आसान नहीं है।
गेहूं की रकम इलाज में लगाई, सर्राफा व्यापारियों के पास कम मांग
इस समय गेहूं की फसल तैयार हो चुकी है। ऐसे में किसी काश्तकार के यहां कोई कोरोना से पीड़ित होता है तो इलाज में वह फसल की रकम लगा दे रहा है। आलमगिरीगंज के एक प्रमुख सर्राफा व्यापारी का कहना है कि उनके पास भी चार लाइसेंस हैं। शहर में करीब साढ़े तीन हजार लाइसेंस जारी हुए हैं। ये कारोबारी 13 से 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से लोन देते हैं।
व्यापारी का कहना है कि छोटी रकम लेने वाले तो लोग आ रहे हैं लेकिन इस समय गेहूं का सीजन है। इसलिए किसी काश्तकार को इलाज के लिए रुपयों की जरूरत होती है तो वह फसल की रकम लगा देता है।
केस-एक
मां की चिता के लिए बेटी के पास नहीं थे लकड़ी खरीदने के पैसे
राजेंद्रनगर में रहने वाली एक 90 वर्षीय महिला को कोरोना हो गया। एक निजी अस्पताल में कई दिनों तक इलाज चला और उसमें उसके परिजनों की मोटी रकम खर्च हो गई। बताते हैं कि घर में कमाई का कोई मजबूत जरिया नहीं था। ऐसे में बुजुर्ग के इलाज में भी काफी रकम खर्च हो गए। घरवालों को इलाज की रकम चुकता करने के लिए इधर-उधर से भी रकम का इंतजाम करना पड़ा। परिवार के सामने आर्थिक तंगी इतनी हो गई कि बुजुर्ग की बेटी ने संजयनगर श्मशान में मुखाग्नि दी। उसके पास चिता की लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे तो उसने नगर निगम से सहायता के तौर पर मिलने वाली मुफ्त लकड़ी लेनी पड़ी।
केस-दो
खेती का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा
रिठौरा के पास एक गांव में रहने वाले एक परिवार में बुजुर्ग को कोरोना हो गया। बरेली से एक निजी अस्पताल में करीब एक हफ्ते तक इलाज चला। हर दिन आईसीयू का खर्च और महंगी दवाईयों में दो लाख रुपये से ज्यादा का खर्च हो गया। खाते की पूरी रकम खत्म हो गई। फिर खेत का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। उसके बाद इलाज व दवाओं के साथ अंत्येष्टि का इंतजाम करना पड़ा। परिजनों ने यहीं शहर के एक श्मशान में शव का अंतिम संस्कार किया। श्मशान वालों ने नगर निगम से मिलने वाली चिता के लिए मुफ्त की लकड़ी के बारे में बताया लेकिन परिजनों ने लेने से इंकार कर दिया।
केस-तीन
एक गरीब से, पहले अस्पताल और फिर एंबुलेंस वाले ने ऐंठी मोटी रकम
मॉडल डाउन में रहने वाले एक बुजुर्ग को कोरोना हो गया। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसी तरह से घरवालों ने बुजुर्ग का एक निजी अस्पताल में इलाज कराया। उसमें उनकी काफी रकम खर्च हो गई। किसी तरह से रकम का इंतजाम किया लेकिन बुजुर्ग को बचाया नहीं जा सका। इसके बाद एंबुलेंस वाले ने शव को कुछ ही दूर पर संजयनगर श्मशान तक शव ले जाने के लिए 7000 रुपये ऐंठ लिए। श्मशान वालों ने हड़काया भी लेकिन एंबुलेंस चालक नहीं माना।
