उम्मीद की किरण
कोरोना की दूसरी लहर में भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज की गई, वहीं कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई। उम्मीद की जा रही है कि कोविड की दूसरी लहर के चालू वर्ष में अर्थव्यवस्था को कृषि फिर से बचा सकती है। सकल मूल्य वर्धन के संदर्भ में, अर्थव्यवस्था 6.2 प्रतिशत सिकुड़ गई, लेकिन कृषि …
कोरोना की दूसरी लहर में भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज की गई, वहीं कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई। उम्मीद की जा रही है कि कोविड की दूसरी लहर के चालू वर्ष में अर्थव्यवस्था को कृषि फिर से बचा सकती है। सकल मूल्य वर्धन के संदर्भ में, अर्थव्यवस्था 6.2 प्रतिशत सिकुड़ गई, लेकिन कृषि 3.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी।
सामान्य वर्ष में भी 3.6 प्रतिशत की वृद्धि को प्रभावशाली माना जाएगा। महामारी के दौर में तो यह आंकड़ा उल्लेखनीय है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला है, बेहतर मानसून की संभावना। मौसम विभाग का कहना है कि इस बार बारिश सामान्य से ज्यादा 101 फीसदी होगी। अगर अनुमान सही साबित होता है तो भारत में लगातार तीसरे साल ये अच्छा मानसून होगा।
हालांकि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और मध्य प्रदेश के कुछ इलाके में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है। वहीं, मध्य भारत के राज्यों में सामान्य से अधिक बारिश की संभावना है। असल में भारत में खेती योग्य 60 फीसदी से ज्यादा जमीन ऐसी है, जहां सिंचाई का ठीक प्रबंध नहीं है। ऐसे में उन क्षेत्रों में किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर रहते हैं।
बेहतर मानसून से ज्यादा पैदावार का मतलब है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आय में सुधार होगा। इससे अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अवसर मिलता है। दूसरा, 2020 में लॉकडाउन के दौरान कृषि क्षेत्र को छूट दी गई थी। आपूर्ति में व्यवधान न्यूनतम थे। बुवाई के मौसम में श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी, शहरी क्षेत्रों से श्रमिकों की वापसी ने इस क्षेत्र में मदद की। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अधिक अनाज खरीदने की सरकारी नीतियों से भी कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलने में मदद मिली।
मनरेगा से 77.9 हजार करोड़ रुपये ग्रामीण लोगों के हाथों में पहुंचे। भले ही इस साल के मानसून के लिए भविष्य वाणियां अच्छी हैं, परंतु कुछ अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं। कोविड-19 की पहली लहर के मुकाबले दूसरी लहर ने ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। बीज, खाद व डीजल आदि के दाम बढ़ने से लागत मूल्य में वृद्धि होगी और बुवाई वाला क्षेत्र कम हो सकता है।
हाल के दिनों में 97 प्रतिशत भारतीयों को आय में कमी का सामना करना पड़ा है। इसलिए यह देखना बाकी है कि कृषि कीमतों का क्या होता है। वैश्विक कीमतें अधिक हैं, इसलिए निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन कृषि विकास को बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं हो सकता है।
