उत्तराखंड बनते ही राजनीतिक पटल पर छा गईं थीं ‘इंदिरा’

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हल्द्वानी, अमृत विचार। डॉ. इंदिरा हृदयेश उत्तर प्रदेश के समय से ही राजनीति में सक्रिय हो गईं थीं। वह उत्तर प्रदेश के समय में शिक्षक कोटे से विधान परिषद की सदस्य थीं। राज्य गठन के बाद जब हरीश रावत को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था तब उन्होंने इस बात पर खुलकर नाराजगी जताई …

हल्द्वानी, अमृत विचार। डॉ. इंदिरा हृदयेश उत्तर प्रदेश के समय से ही राजनीति में सक्रिय हो गईं थीं। वह उत्तर प्रदेश के समय में शिक्षक कोटे से विधान परिषद की सदस्य थीं। राज्य गठन के बाद जब हरीश रावत को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था तब उन्होंने इस बात पर खुलकर नाराजगी जताई थी और स्वयं को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष न बनाए जाने से काफी दिनों तक नाराज भी रहीं। 2002 में जब उत्तराखंड में पहले विधानसभा चुनाव हुए तब वह हल्द्वानी विधानसभा सीट से खड़ीं हुईं और भाजपा के कद्दावार नेता बंशीधर भगत को हरा दिया।

इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार में लोक निर्माण विभाग, सूचना प्रौद्योगिकी, संसदीय कार्य मंत्री जैसे अहम मंत्रालयों को संभाला। कहा जाता है कि एनडी तिवारी के सीएम रहते उस समय सरकार में उनको सीएम नंबर दो की हैसियत थी। हालांकि उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए विकास के कामों को चुना। उनके शासन के दौरान उनके विधानसभा क्षेत्र हल्द्वानी में ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में सड़क निर्माण में उल्लेखनीय कार्य हुआ। लेकिन राज्य में हुए 2007 के विधानसभा चुनाव में वह हल्द्वानी विधानसभा सीट से भाजपा के नेता बंशीधर भगत से चुनाव हार गईं। हालांकि इस चुनाव में उनकी हार का बड़ा कारण कांग्रेस नेता मनोज पाठक के निर्दलीय होकर चुनाव लड़ने को भी माना जाता है। उन्होंने कांग्रेस से जुड़े युवाओं के जमकर वोट काटे थे। इसके बाद एनडी तिवारी भी राज्य की राजनीति से दूर हो गए और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बना दिए गए।

बाद में कांग्रेस पार्टी में अन्य नेता यशपाल आर्या और हरीश रावत ने फिर से अपनी पैठ मजबूत की। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि 2007 से 2012 तक वह हाशिए पर चली गईं थीं लेकिन फिर भी उनके ही पार्टी में उनके विरोधियों ने उनको किनारे लगाने की पूरी कोशिश की। यहां तक की 2012 में उनको हल्द्वानी से टिकट न मिले इसकी पूरी कोशिश उनके विरोधियों ने की, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने उन पर ही विश्वास जताया और उन्होंने हल्द्वानी से रिकार्डमतों से चुनाव जीता।

इंदिरा ने कांग्रेस की बागी नेता और पार्टी छोड़ में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वालीं रेनू अधिकारी को चारों खाने चित कर दिया। इंदिरा एक बार फिर से सरकार में मंत्री बनीं। इस बीच राज्य में हुई राजनितिक उठापठक के दौरान उनका नाम सीएम पद के लिए भी उछला लेकिन वह राज्य में सत्ता के शीर्ष पद तक नहीं पहुंची। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद वह हल्द्वानी से अपनी सीट बचा पाने में कामयाब रहीं। हालांकि कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और उनको नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था।

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