आगे की तैयारी

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Edited By Amrit Vichar
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कोरोना महामारी ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सभी कमजोरियों और नाकामियों को सामने लाकर कर रख दिया। इस महामारी को सौ साल पहले आई प्लेग महामारी की पुनरावृत्ति बताया जा रहा है। प्लेग के बाद भी देश में मलेरिया, चेचक, कालाज़ार, दिमागी बुखार जैसी महामारी आती रही हैं। कोरोना भी, महामारियों का पटाक्षेप नहीं है। …

कोरोना महामारी ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सभी कमजोरियों और नाकामियों को सामने लाकर कर रख दिया। इस महामारी को सौ साल पहले आई प्लेग महामारी की पुनरावृत्ति बताया जा रहा है। प्लेग के बाद भी देश में मलेरिया, चेचक, कालाज़ार, दिमागी बुखार जैसी महामारी आती रही हैं। कोरोना भी, महामारियों का पटाक्षेप नहीं है।

कहा जा रहा है कि कोरोना की और लहरें भी आ सकती हैं। दूसरी लहर में सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग चार लाख लोगों की जान गई। मौतों का कारण, कोविड संक्रमण तो था ही साथ ही सबसे बड़ा काऱण देश का लचर और अपर्याप्त स्वास्थ्य तंत्र रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कोरोना वायरस डिजीज रिपोर्ट-46 के नाम से जारी हुई रिपोर्ट के अनुसार संक्रमितों में से 15 फीसदी को अस्पतालों की और पांच प्रतिशत मरीजों को वेंटिलेटर की जरुरत होती है। जबकि देश मे प्रति 10 हज़ार की आबादी पर, 14 अस्पताल बेड, औऱ एक लाख की आबादी पर 4 वेंटिलेटर सपोर्ट सिस्टम ही उपलब्ध हैं।

देश में स्वास्थ्य संसाधनों की कमी तो है ही साथ ही स्वास्थ्य कर्मियों जिसमें, चिकित्सक, नर्स तथा पैरा मेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 10 हज़ार पर करीब आठ चिकित्सक ही हैं। ऐसा नहीं है कि देश में दूसरी लहर के आने तक स्वास्थ्य ढांचा नहीं बना था। आजादी तक जिला मुख्यालयों पर सिविल अस्पताल बन चुके थे। कुछ मेडिकल कॉलेज भी बने थे। पर आज़ादी के बाद जब योजना आयोग के अनुसार पंचवर्षीय योजनाएं शुरू हुईं तो, पीएचसी और सीएचसी के निर्माण हुए और यह सुविधा गांवों तक पहुंची।

मेडिकल कॉलेज बने, एम्स जैसे सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और शोध संस्थान बने, पर वे बढ़ती आबादी और लोगों में बढ़ती हुई स्वास्थ्य चेतना को देखते हुए पर्याप्त नहीं थे। नीति आयोग ने तो सरकारी अस्पतालों को भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर चलाने का प्रस्ताव दिया है। पर सरकार ने फिलहाल इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया। हालांकि पीपीपी माडल पर संचालित किए जा रहे चलित अस्पतालों का लाभ भी वांछितों को नहीं मिल पा रहा है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की योजनाएं भी केंद्र व कई राज्य सरकारों की आपसी तनातनी में उलझकर रह गईं। अब केंद्र सरकार को इस महामारी से सबक लेकर संभावित तीसरी लहर से लड़ने की तैयारी करनी है। स्वास्थ्य ढांचे मजबूत करने के प्रति उदासीनता छोड़कर एक स्पष्ट नीति बनानी होगी। साथ ही मौसमी बीमारियों के संक्रमण की चेन को रोकने के लिए भी व्यापक प्रबंध करने होंगे।