पंतनगर: कोरोना काल में सिंगल यूज प्लास्टिक व बायो मेडिकल कचरे ने पर्यावरण के लिए बढ़ाई मुश्किलें…

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अर्शी खान, पंतनगर। पर्यावरण को दूषित करने में ग्रीन हाउस गैसों, सिंगल यूज प्लास्टिक, बायो मेडिकल व ई-कचरे की भूमिका  खास है। कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन, सिंगल यूज प्लास्टिक व ई-कचरा उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। हालाँकि, कोरोना काल में पर्यावरण को ग्रीन हाउस गैसों से तो थोड़ी राहत मिली …

अर्शी खान, पंतनगर। पर्यावरण को दूषित करने में ग्रीन हाउस गैसों, सिंगल यूज प्लास्टिक, बायो मेडिकल व ई-कचरे की भूमिका  खास है। कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन, सिंगल यूज प्लास्टिक व ई-कचरा उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। हालाँकि, कोरोना काल में पर्यावरण को ग्रीन हाउस गैसों से तो थोड़ी राहत मिली है, लेकिन पीपीई किट, फेस मास्क, ग्लव्स, हेड कवर व सिरिंज आदि के उपयोग कर फेंकने से प्लास्टिक एवं बायो मेडिकल वेस्ट में काफी इजाफा हुआ है।

उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा के अनुसार कोविड महामारी में जहां टेक्नोलॉजी ने टेलीमेडिसिन, टेली एजुकेशन, टेलीकम्युनिकेशन और अन्य विधाओं से स्थिति को काबू करने में कोई कोर कसर नही छोड़ी। वहीं इससे उत्पन्न कचरों के दुष्परिणामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस दौरान सिंगल यूज प्लास्टिक व बायो मेडिकल कचरे में बेतहाशा इजाफा हुआ है। जिसका सही तरीके से रिसाइक्लिंग व उचित प्रबंधन न होने से जमीन, जलवायु और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार पूरे विश्व में भारी मात्रा में पीपीई किट जिसमें लगभग 89 मिलियन मेडिकल मास्क, 76 मिलियन हैंड ग्लव्स और 1.6 मिलियन फेस कवर के उपयोग का अनुमान महामारी के शुरुआती दौर में ही लगाया गया था। पीपीई किट में लगभग 50 प्रतिशत प्लास्टिक होता है, जिसका मुख्य रासायनिक अवयव पॉली प्रोपाइलिन होता है। विशेषज्ञों के अनुसार पीपीई किट से जमा होने वाले प्लास्टिक को सामान्य रूप से निस्तारित होने में लगभग 500 से अधिक वर्ष लगने का अनुमान लगाया है।

बात अगर ई-कचरे की करें तो वैश्विक स्तर पर ई-कचरे के उत्पादन में चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरे स्थान पर आता है। वहीं देश में क्रमशः महाराष्ट्र, तमिलनाडु व आंध्रप्रदेश, ई-कचरा उत्पादन में सबसे आगे हैं। सीपीसीबी एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 2018-19 के दौरान ई-कचरे का उत्पादन 7,71,251 टन रहा, वहीं 2019-20 में 32 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ 1,14,961 टन दर्ज किया गया। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार प्रदेश में दिसंबर 2020 तक कोरोना के चलते बायो मेडिकल वेस्ट की उत्पादन दर 2.46 मीट्रिक टन प्रतिदिन रही। देश में जहां औसतन प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट दर 0.56 टन प्रतिवर्ष है, वही सिंगल यूज प्लास्टिक चार किग्रा और ई-कचरा उत्पादन 2.40 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष है।

डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा।

इसके बावजूद देश में ई-कचरे का मामूली हिस्सा ही संग्रह हो पाता है। नतीजन शेष हिस्सा बिना निस्तारण पर्यावरण में फैलकर अपने जहरीले व घातक धातु पाानी, मिट्टी व वायु द्वारा मानव शरीर में पहुंच कर नुकसान पहुंचाते है और कैंसर जैसी अन्य बीमारियों को भी जन्म देते है। साथ ही ये हानिकारक धातुएं पानी, मिट्टी और वायु में पाए जाने वाले अन्य जीवों व पादपों की प्रजातियों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करके जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाती हैं।

ग्रीनटेक्नोलॉजी हो सकता है बेहतर विकल्प

देश में ग्रीन टेक्नोलॉजी को तभी बढ़ावा मिल सकता है, बशर्ते वह जनमानस के लिए किफायती हो। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार पिछले पांच वर्षो में देश की सोलर ऊर्जा उत्पादन क्षमता में ग्यारह गुना इजाफा हुआ है। जिससे भारत सोलर ऊर्जा क्षमता में इटली को पछाड़कर पांचवें पायदान पर आ चुका है। इसी तरह बायो डीजल, इलेक्ट्रॉनिक व सीएनजी वाहनों के संचालन से वातावरण में हानिकारक गैसों की मात्रा को काफी हद तक कम किया जा सकता है। भविष्य में ग्रीन टेक्नोलॉजी को डीजल, पेट्रोल और कोयले का एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

प्लास्टिक हमारी जरूरत या मजबूरी

पहले पत्तल, दोने, मिट्टी के कुल्लड व बर्तन आदि के उपयोग पर्यावरण के अनुकूल थे, जिनकी जगह आज प्लास्टिक व थर्माकोल ने ले ली है। दुर्भाग्य से प्लास्टिक सर्वत्र व्याप्त हो चुका है, ऐसे में प्लास्टिक को व्यावहारिक जीवन से हटाना नामुमकिन सा हो गया है। नतीजन प्लास्टिक प्रदूषण दिनों-दिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। जो अंततः हवा, पानी व मिट्टी को प्रभावित करता है, जिसका सीधा सरोकार मानव जीवन से है। ज्यादातर घरेलू उपयोग व अन्य आवश्यकता की चीजें अब प्लास्टिक आधारित हो चुकी है, ऐसे में यह कह पाना मुश्किल हो रहा है कि प्लास्टिक आज हमारी जरूरत है या मजबूरी। बिना इस गुत्थी को समझे पर्यावरण संरक्षण के हित की बात करना यकीनन दिखावा सा प्रतीत होता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रत्येक व्यक्ति का योगदान बहुत जरूरी है। पर्यावरण को स्वच्छ रखे बिना स्वस्थ जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है।
-डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा, वैज्ञानिक अधिकारी, जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी

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