राहत पैकेज

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश में मची तबाही से उबरने में न जाने कितना वक्त लगेगा। पहली लहर में देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिरी थी। लॉकडाउन ने रोजगार पर चोट की थी और आज भी देश के निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब तबके के लोग इस चोट से उबर नहीं पाए हैं। …

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश में मची तबाही से उबरने में न जाने कितना वक्त लगेगा। पहली लहर में देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिरी थी। लॉकडाउन ने रोजगार पर चोट की थी और आज भी देश के निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब तबके के लोग इस चोट से उबर नहीं पाए हैं। दूसरी लहर ने हालात और बिगाड़ दिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। जीडीपी माइनस में चली गई। लंबे समय से उम्मीद की जा रही थी कि सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के इरादे से आर्थिक राहत पैकेज देगी। अब सरकार ने राहत पैकेज का ऐलान किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कोविड महामारी से प्रभावित स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये की ऋण गारंटी योजना समेत विभिन्न उपायों की घोषणा की है।

साथ ही उन्होंने सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र के लिए आपातकाल ऋण गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) के तहत सीमा 50 प्रतिशत बढ़ाकर 4.5 लाख करोड़ रुपये किये जाने का ऐलान भी किया। उम्मीद की जानी चाहिए कि महामारी से जूझ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में यह पहल कुछ मददगार साबित होगी। जो घोषणाएं हुई हैं, उनसे त्वरित उत्साह तो नजर आएगा, लेकिन इसका दूरगामी असर कितना होगा, इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनी (सीआईसी) की एक रिपोर्ट बताती है कि देश की कुल कामकाजी आबादी के करीब आधे लोग कर्जदार हैं। जनवरी 2021 तक भारत की कुल कामकाजी आबादी 40.07 करोड़ थी, जबकि खुदरा ऋण बाजार में 20 करोड़ लोगों ने किसी न किसी रूप में कर्ज लिया है। एक दशक में बैंकों ने खुदरा ऋण को प्राथमिकता दी, लेकिन महामारी के बाद इस खंड में वृद्धि को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। कोई बैंक कर्ज के बोझ तले दबे कारोबारी लोगों को ऋण नहीं देगा।

वैसे भी कर्ज के बोझ से दबे या नगदी की किल्लत का सामना कर रहे कारोबारी अब और अधिक कर्ज नहीं चाहते। उस स्थिति में मांग (उपभोग) से अर्थव्यवस्था में गति नहीं आएगी जहां नौकरियां खत्म हो गई हों और आय कम हो गई हो। बेहतर होता कि कोरोना संकट से प्रभावित तबके को सीधी आर्थिक मदद मिलती। सीधे हाथ में नकदी पहुंचने से जहां महंगाई की मार से कुछ राहत मिलती, वहीं आर्थिक तरलता बढ़ने से बाजार में उछाल आता, जिससे पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में मदद मिलती।