बड़ा फैसला
कोरोना ने सारे देश को हिलाकर रख दिया। तो कई परिवारों में मातम पसर गया। लाखों परिवारों की आर्थिक स्थिति गड़बड़ हो गई। इस बीच बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कोरोना महामारी से जान गंवाने वालों के परिजनों को मुआवजा देने का रास्ता साफ कर दिया है। शीर्ष …
कोरोना ने सारे देश को हिलाकर रख दिया। तो कई परिवारों में मातम पसर गया। लाखों परिवारों की आर्थिक स्थिति गड़बड़ हो गई। इस बीच बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कोरोना महामारी से जान गंवाने वालों के परिजनों को मुआवजा देने का रास्ता साफ कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने कहा है कि कोरोना से हुई मौतों पर मुआवजा देना ही होगा, भले यह रकम कितनी भी हो। उचित रकम का निर्धारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली एनडीएमए करे। जबकि केंद्र सरकार ने इससे पहले वित्तीय क्षमता से बाहर बताकर मुआवजा देने से पल्ला झाड़ लिया था। कहा था कि केंद्र एवं राज्य सरकारें गंभीर आर्थिक परेशानी में हैं। आंकड़ों के अनुसार देश में अब तक कोरोना से 3.98 लाख लोग जान गंवा चुके हैं।
न्यायालय ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को निर्देश दिया कि कोविड-19 से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को आर्थिक मदद देने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। आपदा के कारण जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों के लिए वित्त आयोग के प्रस्ताव के अनुरूप बीमा योजना बनाई जाए। कोविड-19 से मौत होने की स्थिति में मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को बनाया जाए। जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली बेंच ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एक्ट की धारा-12 का जिक्र करते हुए कहा कि आपदा में मृत्यु पर मुआवजा दिए जाने का प्रावधान किया गया है, जिसे पूरा करना सरकार का दायित्व है।
इस संबंध में न्यायालय ने तीखी टिप्पणी की है कि एनडीएमए अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहा है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एमआर शाह की विशेष पीठ ने कहा कि अदालत आर्थिक मदद की एक निश्चित राशि तय करने का निर्देश केंद्र को नहीं दे सकती। केंद्र और एनडीएमए को निर्देश दिया कि कोविड-19 से मरे लोगों के परिजन को दी जाने वाली राहत के न्यूनतम मानदंड के लिए छह सप्ताह के अंदर दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
उच्चतम न्यायालय ने मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल करने का भी निर्देश दिया। अब सरकार आगामी छह सप्ताह के भीतर गाइडलाइन तय करके देश में उपलब्ध संसाधनों तथा उपलब्ध धन को ध्यान में रखते हुए एक उचित राशि तय तो कर सकती है। सरकार को यह भी सोचना होगा कि ऐसे मामलों में प्रभावितों का हित सुनिश्चित करने के लिए अदालत के दखल की जरूरत क्यों पड़ती है।
