भारत की चिंता
आगामी 11 सितंबर तक अमेरिका, अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी की घोषणा कर चुका है। अमेरिका व नाटो सैनिकों की वापसी से उत्साहित तालिबानी करीब एक-तिहाई अफगान जिलों पर कब्जा कर चुके हैं। करीब एक हजार सैनिकों के ताजिकिस्तान भागने के समाचार हैं। अफगानिस्तान में बीस साल तक तालिबान के खिलाफ लड़ाई का केंद्र …
आगामी 11 सितंबर तक अमेरिका, अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी की घोषणा कर चुका है। अमेरिका व नाटो सैनिकों की वापसी से उत्साहित तालिबानी करीब एक-तिहाई अफगान जिलों पर कब्जा कर चुके हैं। करीब एक हजार सैनिकों के ताजिकिस्तान भागने के समाचार हैं।
अफगानिस्तान में बीस साल तक तालिबान के खिलाफ लड़ाई का केंद्र रहे सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बगराम एयरबेस को अमेरिकी सैनिकों द्वारा खाली करना बताता है कि वहां जल्दी ही विदेशी सेनाओं की वापसी का काम पूरा होने वाला है। वर्तमान में अफगानिस्तान में सत्ता और शक्ति के दो ध्रुव हैं, पहला चुनी हुई सरकार और दूसरा तालिबान। भारत चुनी हुई सरकार के साथ पिछले 20 सालों से काम कर रहा है। वहीं, पाकिस्तान और तालिबान का गठजोड़ जगजाहिर है।
पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई तालिबान को आर्थिक सहायता व हथियार मुहैया कराती है। तालिबान ने फिर इस्लामिक राज्य स्थापित करने की कवायद में अपने कब्जे वाले इलाकों में पुरुषों को दाढ़ी रखने, महिलाओं को घरों में रहने के निर्देश दिए हैं। निश्चय ही आने वाले समय में अफगानिस्तान में खूनी संघर्ष तेज होने वाला है। निर्वाचित सरकार भी जल्दी से तालिबान के सामने झुकने वाली नहीं है और तालिबान भी पीछे हटने वाला नहीं है।
तालिबान आत्मघाती हमले करके लोगों को भयभीत कर रहे हैं। बहरहाल, अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद निश्चित रूप से अफगानी सेना तालिबान के खिलाफ निहत्थी नजर आ रही है। वैसे तालिबान के लिये यह लड़ाई जीतना इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि सरकार ने अफगान सेना को राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिये उसमें अफगान ताजिक, उजबेकों व शिया कमांडरों को भी जगह दी है। लेकिन विदेशी सेनाओं की वापसी से उनका मनोबल जरूर प्रभावित होगा।
अतीत में भी तालिबान से अल-कायदा के गहरे रिश्तों का खेल पूरी दुनिया ने देखा। दुनिया को चिंता इस बात को लेकर होनी चाहिए कि अफगानिस्तान में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की वापसी हो रही है। यही वजह है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते वर्चस्व के बाद भारत की चिंताएं गहरी हो गई हैं कि कहीं कट्टरपंथी आईएसआईएस को पाक खुफिया एजेंसियों की मदद से जम्मू-कश्मीर में चरमपंथ के विस्तार का मौका न मिल जाये।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत होता है तो यह भारत के लिए चिंता का विषय होगा। अफगानिस्तान को विकसित करने के लिए भारत ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। चिंता अफगानिस्तान में बसे भारतीय मूल के लोगों की सुरक्षा की भी है।
