कानून पर सवाल
उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को राजद्रोह कानून को औपनिवेशिक-काल का दंडात्मक कानून करार देते हुए इसके प्रावधानों के इस्तेमाल को निरंतर जारी रखने पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत का मानना है कि आजादी के 74 साल बाद भी इस तरह के प्रावधान को बनाए रखना ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन की अध्यक्षता वाली …
उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को राजद्रोह कानून को औपनिवेशिक-काल का दंडात्मक कानून करार देते हुए इसके प्रावधानों के इस्तेमाल को निरंतर जारी रखने पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत का मानना है कि आजादी के 74 साल बाद भी इस तरह के प्रावधान को बनाए रखना ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है।
मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि औपनिवेशिक काल में इस कानून का मकसद स्वतंत्रता संग्राम को दबाना था, जिसका प्रयोग अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और अन्य को चुप कराने के लिए किया था। अदालत ने पूछा कि अब आखिर इस प्रावधान की जरूरत क्या है, जबकि इसके तहत दोष सिद्धि की दर नगण्य है। याचिका में दलील दी गई है कि धारा बोलने की आजादी पर असर डालती है।
देश की कानून व्यवस्था से जुड़ी रिसर्च करने वाली संस्था आर्टिकल-14 डॉट कॉम की इस साल फरवरी में आई रिपोर्ट कहती है कि देश में 2010 से 2020 के बीच 11 हजार लोगों के खिलाफ देशद्रोह के 816 केस दर्ज हुए। गौरतलब है कि इनमें से 65 फीसदी मामले 2014 के बाद दर्ज हुए हैं। कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती याचिका में कहा गया है कि जब 1962 में उच्चतम न्यायालय ने केदारनाथ यादव बनाम बिहार सरकार मामले में कानून को बरकरार रखा था तो उस समय मौलिक अधिकारों की परिभाषा अलग थी।
याचिकाकर्ता ने कहा कि अब इसे फिर से देखने की जरूरत है। इससे पूर्व वर्ष 2020 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मदन बी. लोकुर भी कह चुके हैं स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का सबसे बुरा तरीका व्यक्ति पर राजद्रोह का आरोप लगा देना है। अदालत ने कहा कि ऐसे समय में जब पुराने तमाम कानूनों को हटाया जा रहा है, तब इसकी क्या जरूरत है।
अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इसके बेजा इस्तेमाल को लेकर चिंता है तो फिर कुछ प्रावधानों को हटाया जा सकता है। अदालत की टिप्पणी को इस रूप में देखा जाना चाहिए कि उसकी चिंता कानून के दुरुपयोग को लेकर है। वास्तव में जब हम कानून के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं कि इसका गलत इस्तेमाल अधिक हुआ है। कानून के उपयोग और दुरुपयोग के घातक कॉकटेल का इस्तेमाल बोलने का साहस करने वालों की स्वतंत्रता को बुरी तरह प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में दुरुपयोग रोकने के लिए सरकार की ओर से दिशा निर्देश तो जारी किए ही जा सकते हैं।
