अशांति और अस्थिरता
अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की शुरूआत के साथ ही वहां अशांति और अस्थिरता का दौर शुरू हो गया है। तालिबान का कहर लगातार जारी है। इसकी आड़ में पाकिस्तान भी अपने कुत्सित इरादों को पूरा करने की फिराक में है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने भारत विरोधी साजिशें तेज कर दी हैं। इसी के …
अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की शुरूआत के साथ ही वहां अशांति और अस्थिरता का दौर शुरू हो गया है। तालिबान का कहर लगातार जारी है। इसकी आड़ में पाकिस्तान भी अपने कुत्सित इरादों को पूरा करने की फिराक में है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने भारत विरोधी साजिशें तेज कर दी हैं।
इसी के तहत आईएसआई ने तालिबान में शामिल हुए पाकिस्तानी आतंकियों से कहा है कि बीते कुछ वर्षों में युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में भारत द्वारा निर्मित संपत्तियों पर हमला बोला जाए। भारत ने पिछले दो दशकों से अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के प्रयास में तीन बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश किया है। जिसमें डेलाराम-जरांज सलमा बांध के बीच 218 किलोमीटर की सड़क और अफगान संसद भवन का निर्माण भी शामिल है।
तालिबान ने अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया है और अफगान सेना लगातार उसके सामने कमजोर साबित हो रही है। अफगान सिक्योरिटी एंड डिफेंस फोर्सेज के प्रवक्ता जनरल अजमल शिनवारी के अनुसार अफगानिस्तान के 20 प्रांतों और नौ शहरों में तालिबान के खिलाफ संघर्ष जारी है। तालिबान ने पूर्वोत्तर प्रांत तखर के तालुकान शहर को अपने नियंत्रण में ले रखा है। स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। तालिबान की गोलीबारी की चपेट में नागरिक ठिकाने भी आ गए हैं।
पाकिस्तान भी तालिबान की मदद कर रहा है, ताकि उसके सहारे वह भारत को अफगानिस्तान से दूर कर सके। तालिबान का भारत विरोध भू-राजनीतिक सुरक्षा और अनिवार्यता दोनों पर आधारित है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान तालिबान का संरक्षक रहा है। हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन में विदेश मंत्रियों की एक बैठक में भारतीय प्रतिनिधि एस. जयशंकर ने यह कहते हुए भारत की चिंता व्यक्त की कि अफगानिस्तान का भविष्य उसका अतीत नहीं हो सकता है।
उन्होंने अफगान नेताओं और तालिबान को बातचीत के जरिए स्थायी समाधान खोजने को कहा। अफगानिस्तान में तालिबान की पकड़ मजबूत होने से वहां अंधे युग की शुरुआत हो रही है। चीन और पाकिस्तान की चाल किसी से छिपी नहीं है। दरअसल, भारत इन दोनों देशों की दुखती रग है और ये दोनों अफगानिस्तान में भारत की कोई सकारात्मक भूमिका नहीं चाहते हैं।
अफगानिस्तान पर कब्जा तो करना चाहते ही है, यह भी चाहते हैं कि भारत वहां जितनी भी परियोजनाएं चला रहा है, वे सब बंद हो जाएं। भारतीय एजेंसियां काबुल हवाईअड्डे पर भी करीब से नजर रखे हुए हैं। ऐसे में कूटनीतिक तरीके से पाकिस्तान और चीन की इस चाल को बेअसर करना होगा।
