कब मिलेगी राह
तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान अब भी आंदोलन कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को खत्म कर देगा और उन्हें बड़े कारपोरेट घरानों की दया पर छोड़ देगा। अब किसान आंदोलन का मुद्दा संसद के भीतर भी गूंजेगा और बाहर भी। इसे लेकर किसानों ने पहले ही …
तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान अब भी आंदोलन कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को खत्म कर देगा और उन्हें बड़े कारपोरेट घरानों की दया पर छोड़ देगा। अब किसान आंदोलन का मुद्दा संसद के भीतर भी गूंजेगा और बाहर भी। इसे लेकर किसानों ने पहले ही घोषणा की थी कि अपनी मांग को लेकर मानसून सत्र के दौरान संसद की तरफ मार्च करेंगे।
किसान यूनियनों ने कहा था कि वे मॉनसून सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर ‘किसान संसद’ आयोजित करेंगे और 22 जुलाई से हर दिन सिंघू सीमा से 200 प्रदर्शनकारी इसमें शामिल होंगे लेकिन बुधवार को पुलिस ने किसानों को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने की अनुमति दी है। किसान आंदोलन को करीब आठ माह गुज़र चुके हैं। सरकार के साथ किसान प्रतिनिधियों की 11 दौर की बातचीत भी हो चुकी है। पर बातचीत बेनतीजा रही।
सरकार आंदोलन को लेकर बेफिक्र लगती है, क्योंकि उसका आकलन है कि आंदोलन बिखर कर नाकाम हो चुका है। इधर-उधर विरोध-प्रदर्शन कर अराजकता और भाजपा-विरोधी राजनीति के अलावा, किसान आंदोलनकारियों के पास कोई ठोस मुद्दा शेष नहीं है। सरकार कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि कृषि के तीनों विवादास्पद कानून न तो वापस लिए जाएंगे और न ही रद किए जाएंगे।
किसान आंदोलन के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने तीन सदस्यों की जो समिति गठित की थी, उसने बंद लिफाफे में क्या अनुशंसाएं की हैं, उन्हें भी सार्वजनिक नहीं किया गया है और न ही केंद्र पर कोई दबाव है। किसान सिंघु बॉर्डर, ग़ाज़ीपुर बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर पर धरना देते रहें या जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करें, इससे समाधान तक नहीं पहुंचा जा सकता। 26 जनवरी को आयोजित ट्रैक्टर परेड राजधानी की सड़कों पर अराजक हो गई थी। हजारों प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिये थे और लाल किले की प्राचीर पर एक धार्मिक ध्वज फहरा दिया था।
उधर विपक्षी कांग्रेस, अकाली दल और आप आदि ने किसान आंदोलन के मुद्दे पर संसद में ‘काम रोको प्रस्ताव’ के नोटिस दिए हैं। हालांकि लोकसभा में यह स्पीकर का विशेषाधिकार है कि वे ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार करें अथवा नहीं। अलबत्ता वह किसी और नियम के तहत किसान आंदोलन पर चर्चा करवा सकते हैं। संसद में किसान आंदोलन के अलावा, कोरोना वायरस की दूसरी लहर, महंगाई, बेरोज़गारी, फोन टैपिंग के जरिए मंत्रियों, पत्रकारों और वकीलों की जासूसी, टीकाकरण नीति आदि भी महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। सरकार को 23 विधेयक भी पारित कराने हैं। बहरहाल संसद को सिर्फ किसान आंदोलन तक समेट कर नहीं रखा जा सकता।
