राजनीतिक मकसद के लिए डेटा प्रोटेक्शन बिल लाने में विलंब

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संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल को लेकर सरकार का रवैया पेगासस जासूसी कांड में उसकी भूमिका को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। इस विधेयक को जिस तरह लगातार टाला जा रहा है उससे प्रतीत होता है कि सरकार को लोगों की प्राइवेसी में दखल के लिए समय चाहिए। …

संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल को लेकर सरकार का रवैया पेगासस जासूसी कांड में उसकी भूमिका को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। इस विधेयक को जिस तरह लगातार टाला जा रहा है उससे प्रतीत होता है कि सरकार को लोगों की प्राइवेसी में दखल के लिए समय चाहिए। क्योंकि एक बार कानून बन जाने के बाद सरकार भी इसके दायरे में आ जाएगी और अनावश्यक रूप से लोगों की जासूसी करना उसके लिए संभव नहीं होगा।

सरकार और भाजपा दोनों की ओर से पेगासस जासूसी कांड की जांच से बचने के लिए नित नए बहाने बनाए जा रहे हैं। साथ ही उल्टे विपक्ष को निशाना बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस मुद्दे पर अब तक सरकार की ओर से इनकार के अलावा ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है जिससे उस पर उठ रहे संदेह के बादल छंट सकें। बल्कि ऐसा लगता है कि वो इस मुद्दे से बचना चाहती है। सरकार के कई कदम इसकी पुष्टि करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन विधेयक को लेकर उसका विचित्र रवैया है। जिसके तहत दो वर्ष बाद भी इस बिल के संसद में पेश होने की सूरत नजर नहीं आ रही।

पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल का ड्राफ्ट 2018 में जस्टिस श्री कृष्णा कमेटी ने तैयार किया था। जबकि 11 नवंबर 2019 में तत्कालीन आइटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसे लोकसभा में पेश किया गया था। लेकिन इसके प्रावधानों पर कुछ सदस्यों की आपत्ति और सुझावों के बाद 11 दिसंबर को इसे समीक्षा के लिए लोकसभा सदस्य मीनाक्षी लेखी की अध्यक्षता वाली 30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द कर दिया गया था। समिति को अपनी रिपोर्ट पिछले साल बजट सत्र में देनी थी। लेकिन दो बार के समय विस्तार और 63 बैठकों के बाद जब समिति मौजूदा मानसून सत्र में अपनी सिफारिशें पेश करने वाली थी, तभी अचानक मीनाक्षी लेखी समेत समिति के पांच सदस्यों को सरकार में मंत्री बना दिया गया। मंत्री बनने के बाद अब ये लोग किसी संसदीय समिति के सदस्य नहीं रह सकते।

इस बीच पीपी चौधरी को, जो कि पहले राज्य मंत्री थे, समिति का नया चेयरमैन बना दिया गया है। जबकि बाकी चार सदस्यों की जगहें अभी भी खाली हैं। चौधरी ने आते ही समिति के लिए तीसरी बार समय विस्तार की मांग करते हुए अब शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट पेश करने का प्रस्ताव संसद से पास करा लिया है।

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जाहिर है कि सरकार का इरादा निकट भविष्य में बिल पेश करने का नहीं है और वो यूपी विधानसभा चुनाव हो जाने का इंतजार कर रही है, जिसमें जासूसी की जरूरत पड़ेगी। चूंकि डेटा प्रोटेक्शन बिल का मसौदा सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज ने तैयार किया था, इसलिए इसमें ज्यादा मीनमेख की गुंजाइश नहीं थी। जो थोड़े बहुत संशोधन होने थे उनका समावेश समिति की कुछ ही बैठकों के बाद किया जा सकता था।

लेकिन कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव और कुछ खुद के राजनीतिक लक्ष्यों के चलते सरकार समिति का काम पूरा होने देना नहीं चाहती। क्योंकि सरकार को जितना ज्यादा समय मिलेगा उतना वो राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध इलेक्ट्रॉनिक जासूसी तंत्र का उपयोग कर सकेगी।

विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार जानबूझकर शुरू से ही डेटा प्रोटेक्शन बिल में देरी कर रही है। लेकिन समिति की संरचना में हालिया उलटफेर बहुराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के दबाव तथा पेगासस मामला उजागर होने के कारण किया गया है। गूगल, फेसबुक, ट्विटर व अमेजॉन जैसी आइटी व सोशल मीडिया कंपनियां भारत में सख्त डेटा प्रोटेक्शन कानून लाए जाने के खिलाफ हैं। इसीलिए समिति की ड्राफ्ट रिपोर्ट सदस्यों को नहीं दी गई।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश का कहना है कि मीनाक्षी लेखी ने जाते-जाते बिना सदस्यों को वितरित किए ही ड्राफ्ट रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंप दी है। जबकि लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीपी आचारी के मुताबिक सदस्यों द्वारा स्वीकार किए बगैर औपचारिक तौर पर रिपोर्ट स्पीकर को सौंपना नियम विरुद्ध है।

पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019 में नागरिकों से जुड़ी व्यक्तिगत इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं (कंप्यूटर, मोबाइल फोन, कार्ड इत्यादि) के संरक्षण का प्रावधान है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत जरूरी चुनिंदा सूचनाओं को छोड़कर अन्य किसी भी ब्यौरे को हासिल करने और साझा करने पर 2 करोड़ रुपये तक के जुर्माने और 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। डेटा संरक्षण, डेटा का दुरुपयोग रोकने तथा कानूनी प्रावधानों को लागू करने के लिए बिल में एक डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है।

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