लखीमपुर-खीरी: शारदा ने वीरान कर दिया मंझरी अहिराना गांव
निघासन/लखीमपुर-खीरी, अमृत विचार। शारदा नदी के कटान से गांव मंझरी अहिराना का वजूद लगभग मिट गया है। नदी ने एक माह के भीतर धीरे-धीरे 24 घरों और सैकड़ों एकड़ भूमि को अपने आगोश में समेट लिया। बाढ़ व कटान पीडि़त खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। उन्हें अभी तक कोई जरूरी सुविधाएं भी प्रशासन ने …
निघासन/लखीमपुर-खीरी, अमृत विचार। शारदा नदी के कटान से गांव मंझरी अहिराना का वजूद लगभग मिट गया है। नदी ने एक माह के भीतर धीरे-धीरे 24 घरों और सैकड़ों एकड़ भूमि को अपने आगोश में समेट लिया। बाढ़ व कटान पीडि़त खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। उन्हें अभी तक कोई जरूरी सुविधाएं भी प्रशासन ने मुहैया नहीं कराई हैं। ग्रामीण नदी ग्रामीण नदी की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं।
मझरी अहिराना गांव में शारदा नदी के कटान ने ऐसी तबाही मचायी कि यहां एक महीने के अंदर 42 घर पानी में समा गए। ये पीड़ित परिवार अब खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। एक महीना गुजरने के बाद भी इनको अब तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। शारदा नदी के कटान से इस गांव में काफी नुकसान हुआ। गांव के लोगों को सरकारी मदद की दरकार है, लेकिन सरकार की ओर से उनको एक महीना गुजरने के बाद भी कोई मदद नहीं मिली है।
जानकी देवी (58) बताती हैं कि उनकी तीन एकड़ जमीन शारदा नदी ने लील ली। अब उनका मकान भी शारदा नदी में समा गया है। अब सिर छिपाने के लिए कोई छत भी नही हैं और न ही कोई सहारा बचा है। रामरति का दर्द भी जानकी देवी जैसा ही है। इनका घरद्वार भी नदी के बहाव में कट गया। एक झटके में नदी उनकी पूरी गृहस्थी अपने साथ ले गयी।
अब परिवार के सभी लोग खुले आसमान में सड़क के किनारे रहने को मजबूर हैं। शारदा नदी के बहाव के कारण जब पहला घर गिरा था, तब से ही गांव वाले अफसरों से मदद की गुहार लगा रहे थे। एक एक कर 42 घर नदी में समा गए। अब कुछ ही घर शेष बचे हैं, लेकिन गांव के लोगों का हाल न तो अफसर जानने आए, न ही नेता। एक महीने बाद अब अधिकारी गांव पहुंचे हैं, जो अब पीड़ितों की सूची बनाकर मुआवजा देने की बात कह रहे हैं।
मंझरी का अहिराना गांव जंगल और हरे भरे खेतों के बीच मे बसा हुआ था। अलख सुबह सूरज की लालिमा में गांव की असल जिंदगी को बयां करता था, लेकिन कुदरत के आगे प्रशासन शासन मदद के नाम पर बौना ही साबित हुआ है। शारदा के कहर ने ग्रामीणों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। यहां के लोगों आशा है कि उनका भला शायद शासन प्रशासन से जुड़ा नुमाइंदा ही कर दें।
