मानवीय निर्णय

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Edited By Amrit Vichar
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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भीख मांगना मानवीय समस्या है और कल्याणकारी राज्यों को इसका हल निकालना चाहिए। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाए जाने की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने बेघरों और भिखारियों को कोरोना टीका लगाए जाने और चिकित्सीय सुविधाएं देने की मांग …

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भीख मांगना मानवीय समस्या है और कल्याणकारी राज्यों को इसका हल निकालना चाहिए। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाए जाने की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने बेघरों और भिखारियों को कोरोना टीका लगाए जाने और चिकित्सीय सुविधाएं देने की मांग पर केंद्र व दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा।

सरकार देश में समय-समय पर भिखारियों के कल्याण के लिए कई योजना लागू करती रहती है। हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिकता मंत्रालय ने मुस्कान योजना तैयार की है। इस योजना के तहत उन भीख मांगने वालों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो भीख मांग कर काम चलाते है। इस योजना में कल्याणकारी उपाय शामिल है। जिसमें पुनर्वास, चिकित्सा सुविधा, बुनियादी दस्तावेज, शिक्षा जैसी चीजें शामिल हैं।

दरअसल देश में अब तक भीख मांगने के बारे में कोई केंद्रीय कानून नहीं है। बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ़ बेगिंग एक्ट, 1959 को ही आधार बनाकर 20 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने कानून बनाए हैं। दिल्ली भी इनमें से एक है। वहीं दूसरा केंद्र शासित प्रदेश है दमन और दीव।

बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ़ बेगिंग एक्ट भीख मांगने को अपराध घोषित करता है। साथ ही पुलिस प्रशासन को शक्ति देता है कि वह ऐसे भीख मांगने वाले व्यक्ति को पकड़कर किसी पंजीकृत संस्था में भेज सके। लेकिन यह कानून गरीबी, अपंगता, गंभीर बीमारियों जैसी किसी मजबूरी के कारण भिक्षावृत्ति अपनाने वालों के खिलाफ हथियार बन गया।

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस अधिनियम की 25 धाराओं को समाप्त कर दिया है। साथ ही, भिक्षावृत्ति के अपराधीकरण को असंवैधानिक करार दिया है। गरीबी, भुखमरी तथा आय की असमानताओं के चलते देश में एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आधारभूत सुविधाएं भी प्राप्त नहीं हो पातीं।

यह वर्ग कई बार मजबूर होकर भीख मांगने का विकल्प अपना लेता है। कई बार गरीबी से पीड़ित ऐसे लोगों की मजबूरी का फ़ायदा कुछ गिरोह भी उठाते हैं। ऐसे गिरोह संगठित रूप से भीख मंगवाने के रैकेट चलाते हैं। देश में मजबूरीवश भिक्षावृत्ति और जबरन कराई जाने वाली भिक्षावृत्ति में अंतर किया जाना आवश्यक है।

साथ ही इन दोनों से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीति बनाए जाने की जरूरत है। सही मायने में भीख मांगना एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है। संगठित तौर पर चलने वाले भिक्षावृत्ति रैकेटों को मानव तस्करी और अपहरण जैसे अपराधों के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए। इसके अलावा मजबूर लोगों तक मौलिक सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए।