हल्द्वानी: शहर में नजर नहीं आते पतंगबाजी के पेच न बच्चों में रहा क्रेज
भूपेश कन्नौजिया, अमृत विचार, हल्द्वानी। वक्त के साथ पतंग उड़ाने के शौकीन कम हो चले हैं नई पीढ़ी को तो कन्ने बांधना तक नहीं आता न इसका मतलब ही पता है। जहां पहले खास पर्वों जैसे रक्षाबंधन और मकर संक्रांति के मौके पर आसमान पर पतंगों के पेच लड़ाए जाते थे, गलियों-कूचों में पतंग लड़ाने …
भूपेश कन्नौजिया, अमृत विचार, हल्द्वानी। वक्त के साथ पतंग उड़ाने के शौकीन कम हो चले हैं नई पीढ़ी को तो कन्ने बांधना तक नहीं आता न इसका मतलब ही पता है। जहां पहले खास पर्वों जैसे रक्षाबंधन और मकर संक्रांति के मौके पर आसमान पर पतंगों के पेच लड़ाए जाते थे, गलियों-कूचों में पतंग लड़ाने के दाव खेले जाते थे अब यह सब धीरे-धीरे गुम होने लगा है।
वक्त के साथ पतंगों के डिजाइन,प्रिंट सब बदल गया मगर कमी है तो पतंगबाजों की। शहर के पतंग विक्रेताओं की दुकान पर अब भीड़ नजर नहीं आती, बाजार में पतंग की तकरीबन 12 वैरायटी हैं जो दो रुपए से लेकर 15 रुपए तक मौजूद हैं। वहीं धागा और मांजा 3 रुपए से लेकर 100 रुपए तक मौजूद हैं। जबकि प्लास्टिक और लकड़ी की चरखी की कीमत बीस रुपए से सौ रुपए तक है। डिमांड पर आकर्षक बड़ी पतंगे भी तैयार की जाती हैं जो काफी मजबूत होती हैं लेकिन लोगों में क्रेज न होने के चलते पतंग कारोबार बिल्कुल फीका पड़ा है। पतंग विक्रेताओं अखलाक अहमद ,राजेश का मानना है कि वह अपने शौक की वजह से यह धंधा कर रहे हैं मगर इस धंधे के भरोसे अब घर नहीं चलता।
जब दिया जाता था पतंगबाजी पर नौशेरवां इनाम
पतंगबाजी के लिए उस्तादों और खलीफों के लिए दिल्ली का लालकिला, शांतिवन और विजयघाट के बीच का मैदान (इसे सावड़े की मस्जिद कहा जाता था) पतंगबाजी के लिए मशहूर था। यहां पुरानी दिल्ली के बड़े उस्ताद पतंगबाज आते थे। बड़े-बड़े बक्सों में पतंगे बंद होती थीं जिनके कन्ने उस्तादों के चेले बांधते थे। पतंग जब आसमान में तन जाती थी तो उस्ताद या खलीफा पेच लड़ाता था। इच्चम (कभी ढील-कभी खींच), खिच्चम (डोर खींच कर) और ढिल्लन (ढील देकर)से पेच लड़ाए जाते थे। पतंग काट दी तो इस तरफ शोर और पतंग कट गई तो उस तरफ शोर। कभी-कभी लड़ाई की नौबत भी आ जाती थी और पत्थर भी चल जाते थे लेकिन दर्शक मामले को संभाल लेते थे। जिस उस्ताद ने अपनी पतंग से नौ पतंगें काट दी उसे नौशेरवां के खिताब से नवाजा जाता था।
पतंग का बदलता स्वरूप
समय के साथ पतंग का स्वरुप भी बदलता जा रहा है। बाजार में नेताओं, सेलेब्रिटी और कार्टून वाली पतंग मौजूद हैं। वर्तमान में बाजार में बिकने वाले पतंगों के स्वरूप और आकार में काफी बदलाव आया है। पहले सादे कागज की पतंग बनती थी, फिर रंगीन हुई और अब यह तस्वीरों में बदल गई है। पतंग के साथ चरखी और डोर में भी बदलाव आया है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज पतंगबाजी
आजादी से पहले पुरानी दिल्ली के लोग अंग्रेजों को चिढ़ाने के लिए पतंगों का इस्तेमाल करते थे। उस वक्त पतंग पर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लिखकर या आजादी के नग्में लिखकर उसे लाल किला के आसपास उड़ाते थे ओर पतंग को ऐसे छोड़ देते थे कि वह किले के अंदर गिर जाए और अंग्रेज उसे पढ़ लें।
पतंगों से आशिकी पुराने वक्त में पतंगबाजी कभी-कभी आशिकी का जरिया भी बन जाती थी। पुरानी दिल्ली में पतंग में खत बांधकर उसे माशूका की छत पर गिराकर उससे जवाब लेने का खेल भी खेला जाता था।
पिछले कुछ सालों से राजनीति में भी पतंगें नजर आ रही हैं इसका ज्यादातर इस्तेमाल आम आदमी पार्टी ने किया है। पिछले साल करप्शन के खिलाफ संदेश वाली पतंगें खूब उड़ती नजर आईं।
पतंगों के होते थे नाम
– आज से कुछ वर्ष पहले तक बाकायदा पतंगों के नाम भी हुआ करते थे। पुराने नाम कुछ अजीब हुआ करते थे जिनमें परियल, शकरपारा, गंडेरी, अंगारा, तिरंगा, नागदार, चांदतारा आदि नाम शुमार थे।
