…तो कालाढूंगी विधानसभा से चुनाव लड़ेंगे मुख्यमंत्री धामी

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अंकुर शर्मा, हल्द्वानी। विधानसभा चुनाव की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, दावेदारों ने सुरक्षित सीट की तलाश तेज कर दी है। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि नैनीताल जनपद की कालाढूंगी विधानसभा सीट वीवीआईपी होने जा रही है। कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सियासी समर-2022 में कालाढूंगी से चुनाव …

अंकुर शर्मा, हल्द्वानी। विधानसभा चुनाव की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, दावेदारों ने सुरक्षित सीट की तलाश तेज कर दी है। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि नैनीताल जनपद की कालाढूंगी विधानसभा सीट वीवीआईपी होने जा रही है।

कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सियासी समर-2022 में कालाढूंगी से चुनाव लड़ सकते हैं। भाजपा संगठन के एक माह पूर्व हुए गोपनीय सर्वे को लेकर इन चर्चाओं को बल मिल रहा है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आगामी विधानसभा चुनाव में अपने गढ़ खटीमा को छोड़कर कालाढूंगी विधानसभा से चुनाव लड़ सकते हैं। सत्तारूढ़ दल भाजपा ने एक माह पूर्व कालाढूंगी विधानसभा में गोपनीय सर्वे कराया है। इस सर्वे में कालाढूंगी के मतदाताओं का रूझान जांचा गया है। इसमें एंटी इंकंबैंसी फैक्टर, किसान आंदोलन का प्रभाव, कांग्रेस व भाजपा की स्थिति, भाजपा के प्रति जनता का झुकाव आदि का आकलन किया गया है।

किसान आंदोलन का तराई में ज्यादा असर
सूत्रों की मानें तो किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर तराई में हुआ है। मुख्यमंत्री धामी वर्तमान में तराई की खटीमा विधानसभा से विधायक हैं। किसान आंदोलन से जहां असर हुआ है तो वहीं, पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी भी नुकसान पहुंचा सकती है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नहीं चाहता है कि सेनापति हारे इसलिए सुरक्षित सीट की तलाश में मुख्यमंत्री के लिए नई जमीन तलाशी जा रही है। नैनीताल जनपद की कालाढूंगी विधानसभा भाजपा की पंरपरागत सीट मानी जाती है। इसलिए चर्चाएं हैं कि मुख्यमंत्री यहां से चुनाव लड़ सकते हैं। विपक्षी दलों को जवाब देने के लिए भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है इसलिए सर्वे भी कराया गया है।

डीडीहाट से भी लड़ने के कयास
मुख्यमंत्री धामी के उनके गृह जनपद पिथौरागढ़ की डीडीहाट विधानसभा से भी चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। डीडीहाट भी भाजपा के लिहाज से सुरक्षित सीट मानी जाती है। वहां भी जनता का रूझान देखा जा रहा है।

ये भी हो सकती हैं वजह
1. उत्तराखंड की जनता बड़ा राजनीतिक उलट फेर करती है। अब तक यहां बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस की सरकार बनी है। अंतरिम सरकार समेत पांच सरकारें बनी हैं। इनमें तीन बार भाजपा और दो बार कांग्रेस है। अब यह छठा चुनाव है इसलिए यह चुनाव संवेदनशील है।
2. उत्तराखंड की राजनीति का एक रिकॉर्ड यह भी है कि यहां मुख्यमंत्री हमेशा चुनाव हारे हैं। साल 2002 में पहली अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी देहरादून नगर से चुनाव हारे। पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने साल 2007 में चुनाव ही नहीं लड़ा। फिर साल 2012 में मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी कोटद्वार से चुनाव हारे। 2017 में मुख्यमंत्री हरीश रावत दो-दो विधानसभाओं हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव हारे। इस को देखते भी भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

भाजपा ने कोई सर्वे कराया था इसकी जानकारी है, लेकिन मुख्यमंत्री के कालाढूंगी से चुनाव लड़ने की बात कोरी अफवाह है। वैसे भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का पूरा प्रदेश है, वह जहां से चाहे चुनाव लड़ सकते हैं।-प्रकाश रावत, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

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