उत्तराखंड में पहली बार दिखाई दी स्मू डक
रामनगर, अमृत विचार। भारतीय उपमहाद्वीप में कभी-कभार आने वाली प्रजाति स्मू डक को उत्तराखंड में पहली बार कॉर्बेट फाउंडेशन (टीसीएफ) के शोधकर्ताओं की टीम द्वारा देखा गया है। कॉर्बेट फाउंडेशन रामनगर में स्थित प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के लिए समर्पित संस्था है। डॉ. हरेंद्र सिंह बरगली के नेतृत्व में शोधकर्ताओं दीप्ति पटवाल, इदरिश हुसैन और …
रामनगर, अमृत विचार। भारतीय उपमहाद्वीप में कभी-कभार आने वाली प्रजाति स्मू डक को उत्तराखंड में पहली बार कॉर्बेट फाउंडेशन (टीसीएफ) के शोधकर्ताओं की टीम द्वारा देखा गया है। कॉर्बेट फाउंडेशन रामनगर में स्थित प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के लिए समर्पित संस्था है।
डॉ. हरेंद्र सिंह बरगली के नेतृत्व में शोधकर्ताओं दीप्ति पटवाल, इदरिश हुसैन और चंद्रशेखर सुयाल की टीम ने तुमरिया जलाशय में इस प्रजाति को पहली बार दिसम्बर 2021 के अंतिम सप्ताह में देखा। पुष्टि करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ( आईयूसीएन) डक विशेषज्ञ समूह के साथ तस्वीरें साझा की गईं। तुमड़िया जलाशय मुख्य रूप से आसपास के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी के स्रोत के रूप में कार्य करता है। यह क्षेत्र तराई-पश्चिम वन प्रभाग के अंतर्गत आता है और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की सीमाओं से बहुत दूर नहीं है।
टीसीएफ पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से तुमरिया, बौर और हरिपुरा जलाशयों में प्रवासी जलपक्षी की स्थिति की लगातार निगरानी कर रहा है। वर्तमान में तुमडिया में कुल 64 जल निर्भर प्रजातियाँ और 18 जलपक्षी प्रजातियां निवासी है। पूर्व में भी टीसीएफ के शोधकर्ताओं ने 2012 में उत्तराखंड से दुर्लभ बीन गूज को पहली बार देखा था।
स्मू (मेर्गेलस एल्बेलस) मर्गेन्सर बतख की सबसे छोटी प्रजाति है, जो की मूल रूप से यूरोपीय पक्षी है । यह एनाटिडे परिवार से संबंधित है । और मर्गेलस वंश की एकमात्र जीवित प्रजाति है। नर मुख्य रूप से सफेद होता है, चेहरे पर काले धब्बा और पीठ काली होती है, जबकि मादा ज्यादातर भूरे रंग की होती हैं जिसका लाल-भूरा सिर और सफेद गाल होते। इनके चोंच का एक सिरा मुड़ा हुआ, तथा किनारे से दाँतेदार होती है। इस प्रजाति के पक्षी की लंबाई 36-44 सेमी तक होती है, और इसका वजन लगभग 500-800 ग्राम तक होता है। मादा नर की तुलना में छोटी होती हैं।
यह प्रजाति यूरोप के उत्तरी टैगा और पैलेआर्कटिक में प्रजनन करती है, मेर्गेलस एल्बेलस आमतौर मीठे पानी की झीलों, जलाशयों, पानी में डूबी हुई लकड़ियों, बर्फ से मुक्त नदियों, लैगून और नदियों के मुहाने में निवास करती है। गोताखोरी बतख की यह प्रजाति शर्मीली प्रकृति की है, तथा छोटे समूहों में पाई जाती है। प्रजाति 1-4 मीटर की गहराई तक गोता लगाकर जलीय पौधों, कीड़ों, घोंघे, मेंढक और मछली इत्यादि खाती है ।यह प्रजाति भारतीय उपमहाद्वीप में कभी कभी शीत प्रवास के लिए आती हैं।
भारत में इसे पहली बार 1922 में देखा गया । उसके 92 साल बाद 2014 में “झज्जर के भिंडावास पक्षी अभयारण्य” में दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में स्मू बतख देखी गई थी। पुनः नवंबर 2021 में यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के हैदरपुर (नमभूमि) आर्द्रभूमि में यह प्रजाति दिखने की पुष्टि की गई है।
यह उन प्रजातियों में से एक है, जिन पर अफ्रीकी यूरेशियन प्रवासी जलपक्षी के संरक्षण का समझौता लागू होता है। इसकी जनसंख्या का रुझान लगातार घटते हुई प्रतीत होता है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की रेड लिस्ट श्रेणी के तहत इस प्रजाति का मूल्यांकन “कम चिंता” की श्रेणी में किया गया है।
