मुरादाबाद : रामलहर के बाद इस सीट पर पांच बार जीती भाजपा
महेंद्र सिंह/ मुरादाबाद, अमृत विचार। प्रदेश की चुनावी राजनीति के इतिहास में 1991 का साल बेहद अहम रहा। यही वह साल था, जहां से भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन की राजनीति से ध्रुवीकरण शुरू किया। बस, यहीं से शुरू हुआ ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट पर कमल खिलने का दौर। 1991 में इस सीट पर भाजपा ने नए …
महेंद्र सिंह/ मुरादाबाद, अमृत विचार। प्रदेश की चुनावी राजनीति के इतिहास में 1991 का साल बेहद अहम रहा। यही वह साल था, जहां से भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन की राजनीति से ध्रुवीकरण शुरू किया।
बस, यहीं से शुरू हुआ ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट पर कमल खिलने का दौर। 1991 में इस सीट पर भाजपा ने नए चेहरे के रूप में कुंवर सर्वेश कुमार पर दांव खेला, जिसमें उन्होंने जनता पार्टी के मोहम्मद उल्ला खान को हराकर बड़े अंतर से जीत दर्ज की। सीट पर कमल की जड़ें ऐसी मजबूत हुईं कि कोई उन्हें उखाड़ नहीं पाया। वर्ष 1993, 1996, 2002 के चुनावों में भी यहां की जनता ने भाजपा के कुंवर सर्वेश कुमार को ही विधान सभा पहुंचाया।
15वीं विधानसभा यानी वर्ष 2007 के चुनावों में इस सीट पर एक बार फिर रोचक मुकाबला देखने को मिला। भाजपा के सर्वेश कुमार की सीधी टक्कर बसपा के विजय यादव से हुई। लेकिन, इस बार भाजपा के मजबूत किले को बसपा ने ध्वस्त कर दिया और यहां से विजय कुमार यादव हाथी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे। 2012 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदले, लेकिन चेहरे वही रहे। इस बार जहां विजय यादव महान दल से लड़े, वहीं कांग्रेस ने नगरपालिका चेयरमैन नवाब जान पर दांव खेला। मगर, इस बार हाथी पर सवार हुए हाजी मोहम्मद इलियास।
भाजपा ने सर्वेश कुमार को ही मैदान में उतारा और इस बार वह कमल खिलाने से नहीं चूके। उन्होंने प्रतिद्वंदी महान दल के प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराकर विधान सभा का सफर तय किया। 2017 के विधानसभा चुनाव मोदी लहर में हुए। इस बार भाजपा ने ठाकुरद्वारा सीट पर राजपाल सिंह चौहान के रूप में अपने पत्ते खोले और उनका सीधा मुकाबला सपा के नवाब जान से हुआ। मगर, वह इस बार कमल न खिला सके।
नतीजन, भाजपा के हाथ से सीट फिसल गई। यहां 17 बार के चुनाव में सपा ने दो बार परचम लहराया है। 2012 के चुनाव के बाद सपा ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगानी शुरू की। 2014 में सर्वेश कुमार के लोकसभा पहुंचने के बाद इस सीट पर उप चुनाव हुआ। इस बार टक्कर सीधी भाजपा और सपा में हुई। सपा ने जहां नवाब जान पर दांव खेला, वहीं भाजपा ने नए चेहरे के रूप में राजपाल चौहान को मैदान में उतारा।
भाजपा की परीक्षा में एक पास तो दूसरा फेल
ठाकुरद्वारा सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती थी। यह ही कारण रहा कि कुंवर सर्वेश कुमार ने इस सीट पर डेढ़ दशक से ज्यादा राज किया। वर्ष 1991 से लेकर 2012 तक के चुनावों में भाजपा ने हर बार उनकी परीक्षा ली, जिसमें वह 2007 के चुनाव को छोड़कर हर बार पास होते गए। इतना ही नहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने उन्हें मुरादाबाद सीट से मैदान में उतारा। उसमें भी वह कसौटी पर खरे उतरे और संसद पहुंचे। वहीं राजपाल चौहान को भी पार्टी ने 2014 के उपचुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में ठाकुरद्वारा सीट से प्रत्याशी बनाया। मगर, भाजपा की इस परीक्षा में वह दोनों बार फेल हो गए। हालांकि, जिलाध्यक्ष की दौड़ में उन्होंने बाजी मार ली।
