बरेली: मुसलमानों को चाहिए उम्दा तालीम और रोजगार

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बरेली, अमृत विचार। चुनाव की रणभेरी बजने के बाद पार्टियों ने अपने उम्मीदवार उतारने शुरू कर दिए हैं। वोटों का जोड़-घटाव तैयार कर पार्टियां अलग-अलग वर्गों को उनके हिसाब से साधने में लगी हैं। मतदाताओं ने भी अपने मुद्दों की फेहरिस्त राजनीतिक पार्टियों की तरफ उछाल दी है। मुसलमानों की अगर बात करें तो राजनीतिक …

बरेली, अमृत विचार। चुनाव की रणभेरी बजने के बाद पार्टियों ने अपने उम्मीदवार उतारने शुरू कर दिए हैं। वोटों का जोड़-घटाव तैयार कर पार्टियां अलग-अलग वर्गों को उनके हिसाब से साधने में लगी हैं। मतदाताओं ने भी अपने मुद्दों की फेहरिस्त राजनीतिक पार्टियों की तरफ उछाल दी है। मुसलमानों की अगर बात करें तो राजनीतिक पार्टियों का गुणा भाग इनके बगैर पूरा नहीं होता, मगर इस कौम के भी अपने मसाइल हैं। चुनाव में मुसलमानों के वोटों की अहमियत जितनी ज्यादा है, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भागीदारी उससे कहीं ज्यादा कम।

बरेली जिले की सभी 9 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटरों का प्रभाव है। जिले की अधिकतर सीटों पर करीब 35 फीसद मुस्लिम वोटर हार जीत तय करते हैं। मुसलमानों का पहला मुद्दा है रोजगार। जिले की एक पहचान जरी जरदोजी और मांझा से भी है। इन दोनों ही व्यवसायों से मुसलमानों की एक बड़ी आबादी का रोजगार जुड़ा है लेकिन कोरोना ने जरी और मांझा कारोबार की कमर तोड़ दी। करीब 1000 छोटे-बड़े जरी कारोबारी जिले में काम कर रहे हैं और हर एक से सैकड़ों दिहाड़ी पर काम करने वाले कारीगर जुड़े हैं। कारोबारी मानते हैं कि जरी-जरदोजी को एक बार फिर चमकाने के लिए सराकारी प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

लोन की योजनाओं को आसान और सहज बनाना होगा। आला हजरत की नगरी के नाम से मशहूर बरेली के वोटरों पर धर्मगुरूओं का प्रभाव भी खासा रहा है। ऐसे में इस बार मुस्लिम धर्मगुरू भी मान रहे हैं कि लोकतंत्र के इस पावन पर्व में जाति-धर्म और नफरत के नाम पर नहीं बल्कि मुद्दों पर वोट दिया जाना चाहिए। शिक्षा में पिछड़ापन दूर करने के लिए मुसलमानों के लिए तालीमी इदारों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।

किसी बहकावे में आने वाला नहीं मुसलमान
उत्तर प्रदेश राज्य हज कमेटी के सदस्य डा. सैयद एहताशामुल हुदा मानते हैं कि मौजूदा वक़्त में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मुस्लिम समाज की मुख्य जरूरतें हैं। प्रधानमंत्री और एक हाथ में कुरान और एक हाथ मे कंप्यूटर की विचारधारा के साथ मुस्लिम समाज के उत्थान के लिये काम कर रहे हैं। मुस्लिम युवा किसी भी बहकावे और तुष्टिकरण की सियासत के जाल में फंसने वाला नहीं है।

लागू होनी चाहिए सच्चर कमेटी की रिपोर्ट
अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट खालिद जीलानी कहते हैं कि मुस्लमानों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू होना बेहद जरूरी है। बच्चों को मुफ्त और उच्चतम गुणवत्ता वाली शि‍क्षा मिले। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में सरकारी स्कूल खुलें। रोजगार में मुसलमानों की भागीदारी बढ़े। प्राथमि‍कता वाले क्षेत्रों के मुसलमानों को ऋ ण सुवि‍धा उपलब्ध कराएं और प्रोत्साहन दिया जाए।

नफरत नहीं विकास के एजेंडे पर करना होगा काम
दरगाह आला हजरत से जुड़े और तंजीम उलेमा-ए-इस्लाम के महासचिव मौलाना शाहबुद्दीन के अनुसार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मुसलमानों के प्रमुख मसले हैं। मुसलमानों के मसाइल अपनी जगह मगर प्रदेश के कमजोर और वंचित वर्ग के मसले हल करने में भी मौजूदा सरकार नाकाम रही है। केवल विकास के एजेंडे पर ही कोई सरकार फल-फूल सकती है। मौजूदा सरकार में विकास के एजेंडे को छोड़कर सिर्फ नफरत के एजेंडे पर काम किया गया।

जुनून से बचकर दिमाग से काम लें मुसलमान
खानकाहे नियाजिया के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी के अनुसार मुसलमानों को पहले खुद अपने अधिकार समझने होंगे। उनके लिए तालीम सबसे ज्यादा अहम है। चुनाव में बहकावों में नहीं आना है नौजवानों को। अगर अच्छी शिक्षा लेंगे तो खुद का अच्छा-बुरा सोच सकेंगे। सबसे पहले मुसमलान अपने बच्चों को शिक्षा की तरफ बढ़ाएं। जुनून से बचकर दिमाग से काम लें।

अपने बुनियादी मुद्दों पर ही वोट करेंगे
तहरीक मदारियत काउंसिल के अध्यक्ष सैयद इंतेखाब आलम के अनुसार, जरी जरदोजी और मांझा जैसे कारोबार मुसलमानों से जुड़े हुए हैं। जिले में इनकी हालत खराब है। सरकार ने कुछ नहीं किया। जो पार्टियां मुसलमानों के वोट पर जीतती आई हैं या इस बार भी उनके वोटों पर सियासत करना चाहती हैं उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने अपने एजेंडे में मुसलमानों के लिए क्या किया। मौजूदा वक्त में नफरत की सियासत का बोलबाला रहा है। लेकिन फिर भी मुसलमान अपने होश हवास नहीं खोया है और पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने बुनियादी मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट करना चाहेगा।

जरी नगरी की पहचान बचाना है जरूरी
कोरोना काल के शुरू होने के बाद से ही जरी कारोबारियों की तो जैसे कमर ही टूट गई है। सरकार लोन की कई योजनाएं तो चला रही है मगर जटिलताओं के कारण इसका लाभ नहीं मिल पाता। इनको आसान किया जाना चाहिए। बरेली को जरी नगर के नाम से भी जाना जाता है लेकिन मौजूदा वक्त में इस कारोबार का वजूद बचाने की जरूरत है।

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