मुरादाबाद : बूथ पर पहुंचते ही मतदान पार्टियों की खूब होती थी आवभगत

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Edited By Amrit Vichar
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अविक ठाकुर/अमृत विचार। विधानसभा चुनाव हो लोकसभा का समर, मतदान पार्टियों की बूथों पर पहुंचते ही पहले खूब आवभगत होती थी। मतदान टीम भी उत्सव मानकर सेवा लेने में हिचकते नहीं थी। कुर्सी की चाहत में प्रत्याशी मतदान कार्मिकों की सेवा में पीछे नहीं रहते थे, लेकिन बदली परिस्थितियों और आयोग के सख्त तेवर से इस …

अविक ठाकुर/अमृत विचार। विधानसभा चुनाव हो लोकसभा का समर, मतदान पार्टियों की बूथों पर पहुंचते ही पहले खूब आवभगत होती थी। मतदान टीम भी उत्सव मानकर सेवा लेने में हिचकते नहीं थी। कुर्सी की चाहत में प्रत्याशी मतदान कार्मिकों की सेवा में पीछे नहीं रहते थे, लेकिन बदली परिस्थितियों और आयोग के सख्त तेवर से इस आवभगत का रंग फीका पड़ रहा है।

चुनाव प्रचार में जहां मतदाता को लुभाने के लिए हर दांव पेंच आजमाए जाते हैं वहीं मतदान टीम के बूथ पर पहुंचते ही स्वागत करना मानों परंपरा का हिस्सा बना रहा। मतदान कार्मिक भी खुद की तैयारी से अधिक बूथ पर मिलने वाली सेवा भाव को दिल में संजो कर पहुंचते थे। होता भी यही था, गांव के प्रधान हों या वार्ड के पार्षद व सभासद उनके द्वारा पोलिंग पार्टियों की खूब आवभगत की जाती रही। इसे कुर्सी से जोड़कर भी देखा जाता था, प्रत्याशी भी इनकी खुशामद करने में पीछे नहीं रहते थे, हर स्तर से उनकी सेवा कर अपने पक्ष को मजबूत करने की जतन करते रहे।

लेकिन अब चुनाव आयोग के सख्त तेवर और नजर रखने के हाईटेक इंतजाम से यह नजारा बदलने लगा है। क्योंकि टीम की गाड़ियों पर जहां जीपीएस लगा रहता है वहीं हर बूथ पर खुफिया कैमरे की नजर। इस दखल से पोलिंग पार्टियों में शामिल पीठासीन अधिकारी हों या मतदान कार्मिक हर कोई आवभगत से हिचकता है। प्रत्याशियों की सेवा को वह अपने लिए अधिक सुरक्षित नहीं मान रहे। हालांकि आज भी किसी न किसी बहाने मतदान कार्मिकों को खुश रखने का पूरा इंतजाम गांव व शहर के बूथों पर जरूर रहता है।

अमृत विचार से बातचीत में शहर निवासी हरीश भसीन का कहना है कि पहले के दौर में चुनाव आयोग की प्रत्याशियों पर ज्यादा बंदिश नहीं थी। पोलिंग पार्टियां 24 से 48 घंटे पहले ही मतदान केंद्र पर पहुंच जाती थीं। ऐसे में उनको भी वक्त पूरा मिलता था। वह स्थानीय लोगों से घुल मिल जाते थे। पोलिंग पार्टी की ठहरने और खाने की व्यवस्था प्रत्याशी व उनके समर्थकों के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी करते थे। जिससे मतदान कार्मिकों को फीलगुड होता था। इसके सहारे वह थोड़ी रियायत भी देते थे। शाम को किसी खास के लिए मतदान की छूट भी मिल जाती थी।

अब मतदान से चंद घंटे पहले पहुंचती हैं पार्टियां
पहले के दौर में जहां 24-48 घंटे पहले मतदान टीम केंद्र पर पहुंच कर इंतजाम में जुटती थीं। वहीं अब मतदान के चंद घंटे पहले ही पार्टियां बूथों पर पहुंचती हैं। क्योंकि अब आवागमन के साधन के साथ ही पहले जैसे मतदान प्रक्रिया में तामझाम भी नहीं। ईवीएम की बटन दबाने का तरीका लोगों को बताना होता है। ऐसे में स्थानीय लोगों से मिलने जुलने का अवसर कम मिलता है। ऊपर से आयोग के डंडे का डर भी कर्मियों को सताता रहता है। जिससे वह किसी प्रत्याशी की सेवा लेने से भी हिचकते हैं।

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