राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में पिछड़ता गया बाराबंकी, बंद होते जा रहे हैं एक-एक कर उद्योग
बाराबंकी। बाराबंकी उत्तर प्रदेश का एकमात्र ऐसा जिला है जो खेती के साथ-साथ उद्योग धंधों में भी आगे रहा है। लेकिन अब राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में एक-एक कर बड़े उद्योग बंद होते जा रहे हैं। छोटे उद्योगों की भी प्राणवायु निकलती जा रही है। कभी अफीम की खेती के लिए जाने जाना वाला यह …
बाराबंकी। बाराबंकी उत्तर प्रदेश का एकमात्र ऐसा जिला है जो खेती के साथ-साथ उद्योग धंधों में भी आगे रहा है। लेकिन अब राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में एक-एक कर बड़े उद्योग बंद होते जा रहे हैं। छोटे उद्योगों की भी प्राणवायु निकलती जा रही है। कभी अफीम की खेती के लिए जाने जाना वाला यह जिला अब प्रदेश की अर्थव्यवस्था से कदमताल नहीं कर पा रहा है।
कहने के लिए तो जिले में दो औद्योगिक क्षेत्र और चार मिनी औद्योगिक क्षेत्र स्थित है।जिले की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है। कृषि, बायो-गैस संयंत्र, पशुपालन, लघु उद्योग से लोगों को रोजगार मिलता रहा है। सरकारी क्षेत्र की एकमात्र कताई मिल अब दम तोड़ चुकी है।
हजारों मजदूर और कर्मचारी बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। सोमैया आर्गनिक्स जैसे उद्योग बंद हो चुके हैं। देवा रोड के औद्योगिक आस्थान में स्थित अधिकांश उद्योगों में ताले लग चुके हैं। लखनऊ के करीब कुर्सी रोड पर स्थित औद्योगिक आस्थान में भी कई फैक्ट्रियों में ताला लग चुका है।
यहां सिंचाई के साधन उत्तम है। जिले में नहरों का जाल बिछा है। जिससे खेती जरूर अच्छी हो रही है । अफीम की खेती चौपट हो जाने के बाद यहां के किसानों ने मेंथा की खेती अपनाई और अब यह जिला मेंथा उत्पादन में पूरे देश में नंबर एक पर है। लेकिन यहां की पिपरमेंट फैक्ट्री बंद हो चुकी है। जिससे किसानों को मेंथा के दाम नहीं मिल पा रहे हैं। किसान बताते हैं कि अब मेंथा की खेती ही घाटे का सौदा होती जा रही है।
गन्ना उत्पादन में भी इस जिले ने कीर्तिमान कायम किया लेकिन यहां की दो चीनी मिलें बंद हो चुकी हैं। एकमात्र बलरामपुर चीनी मिल ही चल रही है। जिससे यहां के किसान अब बहराइच और फैजाबाद की चीनी मिलों पर निर्भर होते जा रहे हैं। जिसका परिणाम है कि गन्ने का क्षेत्रफल अब मात्र 3.6% रह गया है।
यह एकमात्र ऐसा जिला है जहां के किसान 5 फसलों का चक्र चलाते हैं। जबकि अधिकांश जिलों में दो से तीन चक्र ही चल पाते हैं। यह जिला प्रदेश के प्रमुख आलू उत्पादकों में भी जाना जाता है परंतु किसानों को उनकी उपज का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कोल्ड स्टोरेज की संख्या यहां सीमित है।
जिले से आम और सब्ज़ियों का भी निर्यात किया जाता रहा है। अभी भी यहां आम की बेल्ट काफी मजबूत है। पूरे उत्तर प्रदेश का इकलौता अफीम अधिकारी बाराबंकी में तैनात है लेकिन अफीम की खेती का दायरा सिमट कर रह गया है। मेंथा की खेती जरूर 20000 एकड़ में हो रही है।
हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग में है अग्रणी
जिले में हो रहे बुनाई के उत्पादों में परिधान स्कार्फ, शॉल और स्टोल हैं, जिनका एक अच्छा निर्यात बाजार है। रेयान और सूती धागे कभी यहां उत्पादन होता है। रूमाल उत्पादन केंद्र के रूप में यहां के उद्योगों ने पहचान बनाई है। जरदोजी का भी यहां बड़ा काम होता है। लेकिन बुनकरों का जीवन स्तर उठ नहीं पा रहा है।
विधानसभा चुनाव हो रहे हों या फिर लोकसभा चुनाव यहां के बंद हो रहे उद्योगों को जीवन प्रदान करने का मुद्दा हर चुनाव में उठता रहा है। बुनकरों का जीवन स्तर उठाने की बात सभी राजनीतिक दलों के लोग कहते तो रहे हैं लेकिन चुनाव के बाद यह दबकर रह जाता है।
किसान अपने उत्पादों को बेचने के लिए दूसरे जिलों पर निर्भर हो रहे हैं। यहां खेती भी है संसाधन भी है उत्पादन भी है लेकिन बाजार मुहैया कराने की कोशिश किसी भी सरकार ने नहीं की।
छह विधानसभाओं वाले इस जिले में 5 विधानसभा बाराबंकी संसदीय क्षेत्र में स्थित है तो एक पूरी और एक आंशिक विधानसभा क्षेत्र फैजाबाद संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में जिले छह विधानसभाओं में से 5 पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। दोनों लोकसभा क्षेत्र भी सत्तारूढ़ दल के साथ हैं। लेकिन पिछले 5 साल में यहां एक भी उद्योग नहीं लगे। बंद जरूर हुए।
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