हल्द्वानी: पहाड़ पर कम मतदान, मैदान में बंपर वोटिंग
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। पर्वतीय जिलों में मतदान प्रतिशत कम होता जा रहा है। जबकि मैदान सीटों पर बंपर वोटिंग हो रही है। माना जा रहा है कि पहाड़ में मत प्रतिशत गिरने का कारण ठंड की मार रहा लेकिन इससे भी ज्यादा असर मतदाताओं की नाराजगी दिख रहा है। उत्तराखंड राज्य बनने …
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। पर्वतीय जिलों में मतदान प्रतिशत कम होता जा रहा है। जबकि मैदान सीटों पर बंपर वोटिंग हो रही है। माना जा रहा है कि पहाड़ में मत प्रतिशत गिरने का कारण ठंड की मार रहा लेकिन इससे भी ज्यादा असर मतदाताओं की नाराजगी दिख रहा है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद मैदानी क्षेत्रों में सिमट रहे विकास का असर अब मत प्रतिशत पर भी पड़ रहा है।
उत्तराखंड में सोमवार को विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए। इसके साथ ही अब एक नई बहस जन्म ले रही है। आखिर पहाड़ के मतदाताओं की बेरूखी मतदान के दिन क्यों बढ़ती जा रही है। अल्मोड़ा जिले की सल्ट विधानसभा क्षेत्र में जहां 45.65 प्रतिशत मतदान हुआ है तो वहीं हरिद्वार जिले की लक्सर में 87 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। मैदानी सीटों में कुछ ही सीटें ऐसी हैं जहां मत प्रतिशत 60 प्रतिशत से नीचे रहा है, तो वहीं पर्वतीय सीटों में से कोई भी सीट ऐसी नहीं है जहां पर मतदान का प्रतिशत 70 प्रतिशत तक पहुंच पाया हो।
चौबट्टाखाल में 45.69, प्रतापनगर में 49.23 तो रानीखेत में 49.82 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। जबकि पर्वतीय जिलों में साक्षरता का प्रतिशत मैदानी जिलों से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद मतदान को लेकर जागरूकता मैदानी इलाकों में ज्यादा है।
कम होता रूझान
हल्द्वानी। पुरोला, गंगोत्री, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, नरेंद्रनगर, प्रतापनगर, चौबट्टाखाल, सल्ट, रानीखेत, अल्मोड़ा और नैनीताल वह पर्वतीय सीटें हैं जहां पर पिछले चुनाव की अपेक्षा इस चुनाव में मतदान प्रतिशत कम रहा है।
मतदाताओं की नाराजगी
हल्द्वानी। पहाड़ों में इस समय अच्छी सर्दी पड़ रही है। कई स्थानों पर बर्फ जमी हुई है। हालांकि पिछले चार दिनों से मौसम सामान्य बना हुआ है। एक तरफ माना जा रहा है कि पहाड़ों में ठंड की वजह से मतदान प्रतिशत कम रहा है। लेकिन 14 फरवरी को राज्य के अधिकांश स्थानों पर धूप खिली रही है। कहीं बारिश भी दर्ज नहीं की गई है। ऐसे में माना जा रहा है कि विकास का इंतजार कर रहे पहाड़वासियों में सभी राजनीतिक दलों के लिए नाराजगी पनप रही है। उत्तराखंड में मैदानी इलाकों में विकास हुआ है लेकिन पहाड़ों में विकास की गाथा लिखी जानी अभी बाकी है इसलिए पहाड़वासियों की चुनाव जैसी परंपरा में आस्था कम होती दिख रही है।
अल्पसंख्यक मतदाताओं की वजह से भी आया उछाल
हल्द्वानी। इस बार अल्पसंख्यक मतदाताओं में मतदान को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला है। अल्पसंख्यक आबादी मैदानी इलाकों में ज्यादा है। जो भी विधानसभा सीटें मत प्रतिशत के मामले में शुरूआती क्रम में हैं उन सभी विधानसभा सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की अच्छी संख्या है।
पहाड़ में भाजपा मैदान में कांग्रेस मजबूत
हल्द्वानी। माना जाता है कि कम मत प्रतिशत सत्ता के साथ रहता है तो वहीं ज्यादा मत प्रतिशत का मतलब सत्ता विरोधी रूझान होता है। इस लिहाज से देखा जाए तो मैदानी इलाकों में कांग्रेस मजबूत दिख रहा है। साथ ही पहाड़ में भाजपा आगे दिख रही है। हालांकि पूरी सच्चाई 10 मार्च को ही स्पष्ट हो पाएगी।
पलायन का भी पड़ रहा असर
पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड से करीब 60 प्रतिशत आबादी यानी 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 2018 में उत्तराखंड के 1,700 गांव भुतहा हो चुके हैं, जबकि करीब एक हजार गांव ऐसे हैं, जहां सौ से कम लोग बचे हैं। कुल मिलाकर 3900 गांवों से पलायन हुआ है। पलायन की वजह से पहाड़ उजाड़ होते जा रहे हैं। पलायन राजनीतिक मुद्दा तो है लेकिन इस समस्या को हल करना कोई नहीं चाहता।
टॉप पांच जिले जहां मत प्रतिशत ज्यादा रहा
सीट जिला मत प्रतिशत
लक्सर हरिद्वार 87.00
हरिद्वार ग्रामीण हरिद्वार 82.00
ज्वालापुर हरिद्वार 78.69
सितारगंज यूएसनगर 78.42
झबरेड़ा हरिद्वार 78.07
पांच सीटें जहां सबसे कम हुआ मतदान
सीट जिला मत प्रतिशत
सल्ट अल्मोड़ा, 45.65
चौबट्टाखाल, पौड़ी 45.69
प्रतापनगर टिहरी 49.23
रानीखेत अल्मोड़ा 49.82
घनसाली टिहरी 50.35
उत्तराखंड बनने के बाद पर्वतीय जिलों में विकास कम होने की शिकायत है। यह तो नहीं पता कि इसका मत प्रतिशत पर क्या असर पड़ रहा है लेकिन वहां के लोगों के नाराजगी जरूर देखी गयी है। – सुधीर कुमार, सामाजिक चिंतक
विकास केवल तीन जिलों में ही दिखता है। इसलिए वहां के लोगों में मतदान के लिए उत्साह भी है। पहाड़ों में सुरक्षित प्रसव कराना तक तो पहाड़ जैसी चुनौती है। वहां दुविधाएं कम नहीं हैं।
– गिरीश लोहनी, पर्वतीय जनजीवन के विशेषज्ञ
