हल्द्वानी: पलायन की मार, पहाड़ पर महिला तो मैदान में पुरुष मतदाताओं ने किया अधिक वोट

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नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी, अमृत विचार। पहाड़ में पलायन की मार का असर मतदान में दिख रहा है। रोजी-रोटी कमाने के लिए पुरुष घर से बाहर गए हुए हैं। इसलिए पहाड़ों में महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है। जबकि मैदानी इलाकों में स्थिति विपरीत है। यहां महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से काफी …

नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी, अमृत विचार। पहाड़ में पलायन की मार का असर मतदान में दिख रहा है। रोजी-रोटी कमाने के लिए पुरुष घर से बाहर गए हुए हैं। इसलिए पहाड़ों में महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है। जबकि मैदानी इलाकों में स्थिति विपरीत है। यहां महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से काफी कम है।

उत्तराखंड में पलायन की स्थिति विकट है। पहाड़ों में रोजगार के ज्यादा साधन नहीं होने की वजह से घर के मुखिया को काम की तलाश में राज्य से बाहर जाना पड़ता है। इस वजह से उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को मनीऑर्डरी अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है। राज्य गठन के बाद भी स्थिति मे कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। औद्योगिक नीति के तहत राज्य के मैदानी इलाकों में उद्योगों को स्थापित कर दिया गया। यहां ज्यादातर उत्तराखंडवासियों को कम वेतन में काम करने पर मजबूर होना पड़ा। इस वजह से पलायन की स्थिति पर कोई सकरात्मक असर नहीं पड़ा।

पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड से करीब 60 प्रतिशत आबादी यानी 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 2018 में उत्तराखंड के 1,700 गांव खाली हो चुके हैं, जबकि करीब एक हजार गांव ऐसे हैं, जहां सौ से कम लोग बचे हैं। कुल मिलाकर 3900 गांवों से पलायन हुआ है। अब इसका असर राज्य में मत प्रतिशत पर भी पड़ रहा है।

उत्तराखंड में निपट चुके मतदान के बाद पता चला कि पहाड़ों में विधानसभावार पुरुष मतदाताओं की ज्यादा संख्या होने के बाद भी वोट देने में महिलाएं आगे रहीं। यह कोई महिला जागरूकता का मसला नहीं है। बल्कि यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ज्यादातर पुरुष काम की तलाश में घर से बाहर गए हुए हैं। इस वजह से वोट देने में ज्यादातार महिलाएं ही शामिल रहीं। यह स्थिति कुमाऊं की ज्यादातार पहाड़ी सीटों पर रही। कुछ नाम मात्र की सीटों को छोड़ दें तो महिलाओं के बढ़े मत प्रतिशत ने उत्तराखंड में पलायन की विभिषिका को दर्शा दिया है।

नेताओं के भाषण में लेकिन शासन में नहीं
हल्द्वानी। पलायन की समस्या का समाधान करना नेताओं के भाषणों में ही सीमित है। लेकिन यह सरकार में काम करने वाले मुद्दों में शामिल नहीं है। इस वजह से पलायन की समस्या जस की तसह बनी हुई है। इसलिए यह माना जाए कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में सरकार को चुनने में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी रहती है तो गलत नहीं होगा। हालांकि यह विषय महिला जागरूकता की वजह से होता तो ज्यादा अच्छा था लेकिन यह आंकड़ा पलायन के दंश की वजह से सामने आया है। जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।

मैदान में स्थिति पूरी तरह से विपरीत
हल्द्वानी। पहाड़ी सीटों की अपेक्षा मैदान में स्थिति पूरी तरह से विपरीत है। कुमाऊं के मैदानी इलाकों में जो भी सीटें पूरी तरह से मैदानी सीटें हैं वहां पर पुरुषों का मत प्रतिशत महिलाओं से ज्यादा है। यहां पलायन की समस्या पहाड़ की तरह नहीं है। लोगों को कम से कम पेट भरने के लिए नौकरी के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता है। साथ ही मैदान में किए औद्योगिक विकास की वजह से मैदानी इलाकों में जनसंख्या पर पलायन का ज्यादा असर नहीं पड़ा है।

यह रहे नतीजे
हल्द्वानी। पिथौरागढ़ जिले की धारचूला, डीडीहाट, पिथौरागढ़ और गंगोलीहाट विधानसभा सीटों पर 110922 पुरुषों ने और 120114 महिलाओं ने मतदान किया। बागेश्वर जिले की कपकोट और बागेश्वर सीटों पर 60647 पुरुषों ने और 73266 महिलाओं ने वोट किया। अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट, सल्ट, रानीखेत, सोमेश्वर, अल्मोड़ा और जागेश्वर विधानसभा सीटों पर 131764 पुरुषों ने और 155278 महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया।

चंपावत जिले में लोहाघाट और चंपावत विधानसभा सीटों पर 59044 पुरुषों ने और 66652 महिलाओं ने वोट दिया। नैनीताल जिले में 263337 पुरुषों ने मतदान किया तो वहीं 249042 महिलाओं ने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। यहां केवल कालाढूंगी विधानसभा सीट ही ऐसी है जहां महिलाओं का मत प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है। हालांकि यह अंतर ज्यादा नहीं है। ऊधमसिंह नगर जिले की सभी सात सीटों पर 484500 पुरुषों ने और 452562 महिलाओं ने वोट दिया है।

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