देहरादून: बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं…

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मयंक पाण्डेय, अमृत विचार, हल्द्वानी। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के बाद अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो पाने की वजह से भाजपा, कांग्रेस के नेताओं और प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा दी है। मतदान का प्रतिशत 2017 के चुनाव के लगभग बराबर ही है। बूथ स्तर से जो जानकारियां प्रत्याशियों और दलों के नेताओं …

मयंक पाण्डेय, अमृत विचार, हल्द्वानी। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के बाद अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो पाने की वजह से भाजपा, कांग्रेस के नेताओं और प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा दी है। मतदान का प्रतिशत 2017 के चुनाव के लगभग बराबर ही है। बूथ स्तर से जो जानकारियां प्रत्याशियों और दलों के नेताओं को अब मिल रही हैं। उससे कोई भी दल निश्चिंत होने की स्थिति में नहीं है। मतदान के बाद उत्साह से भरे हुए प्रत्याशी और पार्टियों के बड़े नेता अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे थे, अब उनके तेवर में नरमी साफ देखी जा सकती है।

उत्तराखंड के पांचवीं विधानसभा के लिए 14 फरवरी को हुए मतदान में 65.37 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट देकर 632 प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में दर्ज कर दिया। मतदान कम या ज्यादा होने की स्थिति में भी राजनीतिक दल इसे अपने अपने पक्ष में बताते। अब जब मतदान प्रतिशत भी लगभग बराबर है तो राजनीति के विशेषज्ञों को विश्लेषण करने में दिक्कत महसूस हो रही है। दोनों ही दल भाजपा व कांग्रेस मतदान के उनके पक्ष में होने और अपनी सरकार बनने के दावे भी करने लगे।

कांग्रेस में तो मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए रस्साकशी तक शुरू हो गई। तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे को आगे नहीं किया। दूसरी ओर भाजपा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा। जनता ने किसके भाग्य में क्या लिखा, ये अभी स्ट्रांग रूम में ईवीएम में सीलबंद है। 10 मार्च को ईवीएम खुलने पर जनता का निर्णय सबके सामने होगा, इस बीच राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों ने अपने स्तर पर जीत का गुणा-भाग शुरू कर दिया।

इसके लिए संगठन, विधानसभा क्षेत्र व बूथवार मतदान के आंकड़ों पर माथापच्ची हुई। मजेदार बात यह कि मतदान से पहले जहां भाजपा अबकी बार 60 पार का नारा बुलंद कर रही थी और कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर के सहारे भाजपा का सूपड़ा साफ होने के दावे करते नजर आ रहे थे। अब मतदान के बाद विभिन्न स्तर से मिले फीडबैक और जनता की खामोशी ने नेताओं के सुर में बहुत बदलाव देखने-सुनने को मिल रहा है। जिन सीटों पर डंके की चोट पर जीत का दावा राजनीतिक दल कर रहे थे, अब उन्हीं को लेकर किंतु-परंतु करते सुनाई पड़ रहे हैं। दरअसल, बूथ स्तर से जो फीडबैक मिला है और मतदाताओं की खामोशी ने राजनेताओं की पेशानी पर बल डाल दिये हैं।

मतदान के बाद बदल गए दावे व आंकड़े
मतदान से पहले और उसके तत्काल बाद कांग्रेस पूर्ण बहुमत ही नहीं बल्कि भाजपा का सूपड़ा साफ करने का दावा भी कर रही थी। अब वह सरकार बनाने की बात कर रही है, लेकिन संख्या बल 40 से 45 के बीच रहने के संकेत दे रही है। इतना ही नहीं हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए नेता तो खुले तौर पर कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का क्रेज इस चुनाव में भी बरकरार रहा।

भाजपा ने 60 पार का नारा दिया था और वह अपने इस दावे पर अब भी कायम दिख रही, लेकिन दबे सुर में पार्टी नेता यह कहते भी सुनाई पड़ रहे कि भाजपा बहुमत हासिल कर सरकार बना लेगी। इसकी बानगी तो तब देखने को मिली जब मतदान से पहले ही पार्टी मुख्यालय से अबकी बार 60 पार के बोर्ड और कटआउट हटवा दिये गये।

बेकरारी जितनी भाजपा में, उससे ज्यादा कांग्रेस में
जनता की खामोशी और बूथ स्तर से मिली जानकारियों से दोनों ही दल यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जनता किन मुद्दों पर वोट डालने के लिए बूथ तक पहुंची होगी। दोनों दल एक-दूसरे के चुनावी वादों का तोल-मोल करने के साथ ही मतव्यवहार को अपने-अपने ढंग से परिभाषित करते दिख रहे हैं।

मतदाता ने किसका मान रखा और किसे नकारा, ये तो ईवीएम खुलने के बाद ही सामने आएगा, लेकिन इससे पहले मतदाताओं के व्यवहार को ठीक से समझने के प्रयासों में दल जुटे हैं। दोनों प्रमुख दलों के नेताओं के बयान उनकी मनोस्थिति को बयां कर रहे हैं। बेकरारी जितनी भाजपा में है उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस में है। जनता का आाशीर्वाद किसे मिला, कौन विधानसभा का मुंह देखेगा व कौन घर बैठेगा यह तो 10 मार्च को मतगणना के बाद ही साफ हो पाएगा।

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