बरेली: घर लौटे छात्र बोले- हजारों किलोमीटर दूर हो रही थी बमबारी
बरेली,अमृत विचार। यूक्रेन से मेडिकल के छात्रों की वतन वापसी का सिलसिला जारी है। शनिवार को यूक्रेन में फंसे बरेली के कई छात्र अपने घर लौट आए। परिजनों से मिलने की खुशी उनके चेहरे पर साफ देखने को मिली। कई छात्र यूक्रेन से ही ग्रुप में निकले थे और बरेली भी वह ग्रुप में पहुंचे …
बरेली,अमृत विचार। यूक्रेन से मेडिकल के छात्रों की वतन वापसी का सिलसिला जारी है। शनिवार को यूक्रेन में फंसे बरेली के कई छात्र अपने घर लौट आए। परिजनों से मिलने की खुशी उनके चेहरे पर साफ देखने को मिली। कई छात्र यूक्रेन से ही ग्रुप में निकले थे और बरेली भी वह ग्रुप में पहुंचे फिर यहां से अपने-अपने घरों को रवाना हुए।
बच्चों के घर आने के बाद उनके चेहरों पर सुकून देखा जा रहा है। शनिवार को बरेली की सना, जावेद, सैफ, आसिफ और विशेष ने वतन वापसी की। घर पहुंचे तो घर वालों ने सही सलामत वापसी पर खुशी जताते हुए फूल मालाओं से स्वागत किया। हालांकि जिस संकट के दौर से बच्चे निकलकर आएं उसको बताने में कलेजा कांप जा रहा है।
इज्जतनगर निवासी जितेंद्र मैसी के बेटे विशेष मैसी यूक्रेन के उजगिर्द शहर में रहकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। उनके साथ बुलंदशहर के नरौरा निवासी उनकी बुआ के बेटे विलय भी साथ में वापस लौटे हैं। विशेष की वतन वापसी का उनके नाना विशन राम को बेसब्री से इंतजार था।
मां सीमा मैसी ने बताया कि विशेष के नाना कैंट से सुबह ही घर आ गए और बार-बार नवासे को गले से लगाने के लिए दरवाजे की राह ताकने लगे। उनका विमान सुबह 5 बजे दिल्ली पहुंचा और फिर वह दिल्ली से फ्लाइट के जरिए बरेली पहुंचे। विशेष और विलय ने बताया कि उजगोर्द में हालात सामान्य थे सिवाय बाजार को छोड़कर मगर दहशत फिर भी बरकरार थी।
आलम यह था कि उन्होंने जो जानवर पाले हुए थे वह हमेशा सीने से लिपटे रहते थे। बम भले ही हजारों किलोमीटर दूर गिर रहे हों लेकिन जानवरों तक में इसकी दहशत थी। वापसी में बहुत अधिक परेशानी तो नहीं हुई मगर केवल 800 मीटर बस से चलने के लिए 15 घंटे का इंतजार हंगरी के जोहानी बार्डर पर करना पड़ा।
उजगोर्द से महज 33 किलोमीटर दूरी पर हंगरी जोहानी बार्डर था। इसके बाद हंगरी में हास्टल के कैंप में 5 घंटे गुजारे और फिर दूतावास के अधिकारियों ने एक होटल में उनके रुकने की व्यवस्था कराई। उजगोर्द में हालात भले ही सामान्य हों लेकिन वहां भी शाम 7 बजे से सुबह 10 बजे तक कर्फ्यू रहता था। खाने पीने का सामान कई गुना महंगा हो गया था। इस बीच कई लोगों ने छात्रों की मदद भी की।
ऐसा लग रहा था कि युद्ध क्षेत्र से नहीं निकल पाएंगे
गुलाबराय इंटर कालेज के पास रहने वाली मुस्कान हुसैन यूक्रेन के खारकीव में रहकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहीं थीं। बेटी को मुश्किल में फंसा देख उनकी मां सनोवर हुसैन यहां परेशान थीं। मुस्कान घर वापस लौटीं तो उनके घर आने वालों का सिलसिला जारी है। हर कोई खारकीव में गुजारे दहशत के उन पलों के बारे में जानना चाहता है।
युद्ध छिड़ने के बाद यूक्रेन में रहकर आईं दुश्वारियों के बारें में वह बताती हैं कि खारकीव से लवीव जाने के लिए पूरा एक दिन लगा। ट्रेन में चढ़ने के लिए भी बड़े हाथ पैर मारने पड़े तब जाकर खारकीव से निकले। यहां से कैब के जरिए पौलेंड बार्डर गईं। मगर यहां बार्डर पार करने के लिए ही 25 घंटे लगे। लवीव से पौलेंड तक का सफर ऐसा था कि 24 घंटे तक कुछ नहीं खाया। ऐसा लग रहा था कि हम यहां फंस चुके हैं और अब निकल ही नहीं पाएंगे। बिल्डिंग के बंकर में सुरक्षित महसूस नहीं होता था तो रातें गुजारने के लिए मेट्रों स्टेशन जाना पड़ता था।
इज्जतनगर निवासी दिव्यांश चौरसिया भी घर वापस लौट आए। उन्होंने बताया कि वह यूक्रेन से लवीव शहर में रहकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। लवीव में हालात सामान्य थे। बाजार भी खुल रहा था मगर खाने पीने की चीजे काफी महंगी हो गईं थीं। थोड़ी दिक्कत जो पेश आई वो यूक्रेन की ओर से हंगरी बार्डर में दाखिल होते वक्त आई।
यहां उन्हें और उनके साथियों को करीब 12 घंटे का इंतजार करना पड़ा। भयंकर सर्दी में इस तरह इंतजार करना बेहद कंपा देने वाला था। उनकी घर वापसी पर पिता अशोक चौरसिया ने कहा कि बेटा सही सलामत घर वापस आ गया यही काफी है। बस बेटे के आगे की पढ़ाई को लेकर थोड़े चिंतित हैं। वहीं उनकी मां सुरभि ने घर वापसी पर सबसे पहले बेटे की आरती उतारी और गले से लगाया। तो दिव्यांश ने भी मंदिर में जाकर पूजा की।
ये भी पढ़ें-
