हल्द्वानी: तराई की जनता पहले भी हरा चुकी शीर्ष नेताओं को

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अभिषेक आनंद, हल्द्वानी, अमृत विचार। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गये। इसको लेकर चर्चायें भी बहुत हो रही हैं लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है कि तराई की जनता ने सत्ता को ठुकराया हो। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है जब तराई की यह जनता शीर्ष नेताओं को हरा चुकी है। वर्ष …

अभिषेक आनंद, हल्द्वानी, अमृत विचार। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गये। इसको लेकर चर्चायें भी बहुत हो रही हैं लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है कि तराई की जनता ने सत्ता को ठुकराया हो। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है जब तराई की यह जनता शीर्ष नेताओं को हरा चुकी है।

वर्ष 1977 में नैनीताल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर पं. गोविंद बल्लभ पंत के पुत्र केसी पंत चुनाव लड़ रहे थे। तब किच्छा के देवरिया गांव निवासी युवा चेहरे भारत भूषण ने उन्हें हरा दिया था। दिलचस्प बात यह रही थी कि पहले भारत भूषण ग्राम प्रधान तक का चुनाव हार चुके थे।

उस वक्त पंत को पर्वतीय क्षेत्र ने समर्थन दिया लेकिन तराई में उन्हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद केसी पंत पहाड़ की राजनीति को छोड़कर दिल्ली में ही बस गये। 1998 में भाजपा की लाख कोशिश के बाद भी वह नैनीताल लोकसभा से चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुये। बाद में उनकी पत्नी इला पंत को भाजपा ने चुनाव लड़ाया।

1991 की राम लहर में नैनीताल क्षेत्र से कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी को भी हार का सामना करना पड़ा था। उनका हाल भी केसी पंत जैसा हुआ था। पहाड़ से जीतकर आ रहे तिवारी को तराई की जनता ने हरा दिया था। उस वक्त युवा बलराज पासी भाजपा से सांसद बने थे। एनडी तिवारी विधायक का चुनाव भी लड़े थे और हल्द्वानी विधानसभा से वह विधायक चुने गये थे।

70 के दशक में काशीपुर विधानसभा क्षेत्र की जनता ने अकबर अहमद डंपी को नकार दिया था। यह वह समय था, जब कांग्रेस में संजय गांधी की तूती बोलती थी और डंपी की गिनती संजय गांधी के बेहद करीबियों में होती थी। बाद में डंपी चुनाव लड़े और जीते लेकिन 1984 में नैनीताल लोकसभा से हार गये। अब एक बार फिर तराई की जनता ने पुराना इतिहास दोहराया है।

संबंधित समाचार