इस शक्तिपीठ में श्रद्धालु दर्पण के माध्यम से करते हैं मां दुर्गा के दर्शन, रोचक है मां के धाम की कहानी

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देवभूमि उत्तराखंड में कुछ ऐसे शक्तिपीठ हैं जहां आना मानो हृदय की गहराइयों तक खुशी दे जाता है। यही वजह है कि जो कोई इन धामों में दर्शनों के लिए पहुंचता है तो उसमें अपार ऊर्जा का संचार होता है। इन्हीं में से एक बागेश्वर जिले में स्थित कोट भ्रामरी देवी का मंदिर भी है। …

देवभूमि उत्तराखंड में कुछ ऐसे शक्तिपीठ हैं जहां आना मानो हृदय की गहराइयों तक खुशी दे जाता है। यही वजह है कि जो कोई इन धामों में दर्शनों के लिए पहुंचता है तो उसमें अपार ऊर्जा का संचार होता है। इन्हीं में से एक बागेश्वर जिले में स्थित कोट भ्रामरी देवी का मंदिर भी है।

मां दुर्गा का यह शक्तिपीठ, जहां भंवरे के रूप में मां दुर्गा विराजमान हैं। खास बात यह है कि मां शक्ति के इस रूप के दर्शन सीधे तौर पर संभव नहीं हैं। कोट भ्रामरी देवी के मंदिर में मां दुर्गा श्रद्धालुओं की तरफ पीठ करके विराजमान हैं। दर्पण के माध्यम से ही माता के दर्शन संभव होते हैं। प्रत्येक 12 वर्षों में केवल एक बार इस शक्तिपीठ पर मां भ्रामरी देवी के सीधे दर्शन किए जाते हैं।

मान्यता है कि श्रद्धालुओं के लिए माता की प्रतिमा पीठ की ओर से स्थापित की गई है। अगर इस सलाह का पालन नहीं किया गया तो पूरी कत्यूर घाटी बीमार हो जाएगी। बड़े पैमाने पर आपदा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए देवी की पीठ की ओर से पूजा की जाती है। सितंबर महीने के दौरान भाद्रपद अष्टमी या राधा अष्टमी के दौरान “नंदाष्टमी” के वार्षिक उत्सव को छोड़कर माता के सीधे दर्शन करना वर्जित है। यहां 12 वर्षों में एक बार राज जात यात्रा होती है। पहले नंदाष्टमी के मौके पर भैंस और मेमने की बलि दी जाती थी। पशु संरक्षण समिति ने एक जनहित याचिका नैनीताल उच्च न्यायालय में दायर की थी। हाईकोर्ट ने पशु बलि पर रोक लगा दी है। अब यह प्रथा बंद हो गई है।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कत्यूर घाटी के बीचोंबीच मां कोट भ्रामरी देवी का मंदिर है। इसका पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। मां नंदा सुनंदा के इस धार्मिक केंद्र में हर साल चैत्राष्टमी को विशाल मेला लगता है। नंदा के रूप में इस स्थल पर मूर्ति पूजन, डोला स्थापना और विसर्जन का प्रावधान है। यहां पर चैत्राष्टमी और भादो मास की अष्टमी को मेला लगता है। तब दूर-दराज से श्रद्धालु मां की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। मां के प्रति आस्था व्यक्त करने के लिए श्रद्धालु मंदिर परिसर में घंटे बांधकर जाते हैं। ऐसे हजारों घंटे मंदिर परिसर में देखे जा सकते हैं।

कोट भ्रामरी देवी शक्तिपीठ के महंत बताते हैं कि 2500 ईसा पूर्व से लेकर 700 ईसवी तक कुमाऊं पर कत्यूरी राजवंश का शासन था। इसी दौरान कत्यूर घाटी में एक किला स्थापित किया गया था। यहीं मां भगवती मंदिर है। जिसमें मां नंदा देवी की मूर्ति स्थापित है। जन श्रुतियों के अनुसार, कत्यूरी राजाओं और चंद वंशावलियों की कुलदेवी भ्रामरी और प्रतिस्थापित नंदा देवी हैं। मंदिर में भ्रामरी रूप में देवी की पूजा की जाती है। भ्रामरी रूप में मां दुर्गा मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि मूल शक्ति के रूप में हैं।

केले के पेड़ के रूप में होती है मां की पूजा
माता कोट भ्रामरी के मंदिर का निर्माण कब और किसने किया, यह आज तक रहस्य बना हुआ है। मां भ्रामरी देवी के साथ पौराणिक दैत्य अरुण राक्षस और शुंभ-निशुंभ के संहार की कथा जुड़ी है। इस घाटी में विशाल जलाशय था। जिससे अरुण नामक अत्याचारी राक्षस अपने राज्य में प्रवेश करता था। उसे वरदान था कि वह न तो किसी देवता, न ही किसी मनुष्य, न ही किसी शस्त्र से मारा जा सकता था। देवताओं और मनुष्यों की आराधना पर आकाशवाणी हुई कि इस महादैत्य के संहार के लिए वैष्णवी का अवतरण होगा। महामाया जगत जननी के अलौकिक प्रताप से समूचा आकाशमंडल भ्रमरों से गुंजायमान होकर डोल उठा। भगवती के भ्रामरी रूप ने अरुण नामक महादैत्य का अंत किया। कहा जाता है कि मां नंदा ने दुर्गा का रूप धारण कर महिषासुर का वध किया था। यह भगवती इस दैत्य को थकाने के लिए गांव मवाई (जो तब जंगल हुआ करता था) में केले के पेड़ की ओट में छिप गई थीं। तभी से नंदा देवी की पूजा केले के पेड़ के रूप में की जाती है।


कैसे पहुंचे कोट भ्रामरी मंदिर
कोट भ्रामरी देवी का मंदिर अल्मोड़ा-कौसानी-गरुड़-बागेश्वर मार्ग पर पड़ता है। यहां के लिए हल्द्वानी से बस अथवा टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है। बैजनाथ से करीब चार किमी दूर भगवती माता कोट भ्रामरी देवी का मंदिर है। बैजनाथ और गरुड़ कस्बों में पर्यटकों के ठहरने के लिए अच्छे होटल हैं।

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