हल्द्वानी: रोहिंग्या के बाद अब उत्तराखंड में बंग्लादेशी घुसपैठ
सर्वेश तिवारी, हल्द्वानी, अमृत विचार। प्रदेश में रोहिंग्या की चुनौती के बाद अब बंग्लादेशियों की घुसपैठ की खबर ने हलचल पैदा कर दी है। पिथौरागढ़, बागेश्नर, चम्पावत और नैनीताल जिले में ज्यादा है। खुफिया इनपुट है कि रोहिंग्या और बंग्लादेशियों की उत्तराखंड में घुसपैठ के लिए उत्तराखंड-नेपाल सीमा सबसे मुफीद है। बता दें कि खुफिया …
सर्वेश तिवारी, हल्द्वानी, अमृत विचार। प्रदेश में रोहिंग्या की चुनौती के बाद अब बंग्लादेशियों की घुसपैठ की खबर ने हलचल पैदा कर दी है। पिथौरागढ़, बागेश्नर, चम्पावत और नैनीताल जिले में ज्यादा है। खुफिया इनपुट है कि रोहिंग्या और बंग्लादेशियों की उत्तराखंड में घुसपैठ के लिए उत्तराखंड-नेपाल सीमा सबसे मुफीद है।
बता दें कि खुफिया इनपुट के मुताबिक उत्तराखंड में 600 से ज्यादा रोहिंग्याओं के दाखिल होने की सूचना है। खबर यह मिली कि आतंकी चारधाम यात्रा में इन रोहिंग्या का इस्तेमाल कर सकते हैं। जिसके बाद खुफिया सतर्क हुई और प्रदेश सरकार ने प्रदेश भर में इसके खिलाफ अभियान चलाने के आदेश दिए हैं।
प्रदेश के डीजीपी अशोक कुमार के निर्देश पर दस दिवसीय सत्यापन अभियान की शुरूआत बीते गुरुवार से कर दी गई। नैनीताल जिले में पहले ही दिन 700 से ज्यादा लोगों के सत्यापन किये गये और इसमें एक संदिग्ध भी सामने आया। जिसकी पड़ताल की जा रही है। इन सबके बीच खुफिया को एक और इनपुट यह मिला कि आने वाले कुछ दिनों में रोहिंग्या और बंग्लादेशी नेपाल सीमा के रास्ते उत्तराखंड में दाखिल हो सकते हैं। जिसके बाद राज्य की सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी गई। वर्ष 2017 के आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में रोहिंग्या की संख्या 200 है और अब ये ही उत्तराखंड में दाखिल होने की फिराक में हैं।
घुसपैठ को लेकर हम सतर्क हैं। पूरे जिले में व्यापक स्तर पर सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है। रोहिंग्या और बंग्लादेशियों की घुसपैठ से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, नैनीताल जिले में अभी तक ऐसा मामला सामने नहीं आया है।
– पंकज भट्ट, एसएसपी नैनीताल
ऐसे बन जाते हैं फर्जी राशन कार्ड और आधार कार्ड
हल्द्वानी। खुद को भारतीय साबित करना गैर भारतीयों के लिए बेहद आसान काम है। इसके लिए जरुरत सिर्फ किसी ग्राम प्रधान की होती है या पार्षद की और या फिर पैसों की। अगर पार्षद या ग्राम प्रधान अपने लेटर पैड पर मुहर के साथ यह प्रमाणित कर देता कि यह व्यक्ति उसके क्षेत्र का वासी है तो वह किसी भी तरह प्रमाण पत्र बनवाने का हकदार हो जाता है। फिर वह आधार कार्ड हो या फिर राशन कार्ड और नैनीताल जिले में ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो मूल उत्तराखंडी नहीं है, लेकिन अब इन्हें गैर उत्तराखंड साबित करना आसान भी नहीं है।
मौरूसी काश्तकार के रूप में बसाए गए बंग्लादेशी
हल्द्वानी। भारत-पाकिस्तान बंटवारे को लेकर 16 अगस्त 1946 को बंगाल में दंगा-फसाद और मार काट हुई। जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से लाखों बंगाली भारत आए। वर्ष 1951-52 में पश्चिम बंगाल के ट्रांजिट कैंप के शरणार्थियों को उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिले के दिनेशपुर में मौरूसी काश्तकार के रूप में डेढ़ एकड़ से लेकर आठ एकड़ तक वर्ग आठ (नॉन जैड-ए) के भूमि पट्टे देकर बसाया था। यहां 1954 तक करीब तीन दर्जन से ज्यादा गांव बंगाली बाहुल्य बन चुके हैं। वर्ष 1957-58 में मध्य प्रदेश के रायपुर जिले के माना कैंप सहित कई अन्य शिविरों के शरणार्थियों को शक्तिफार्म के दस गांवों में जमीन देकर बसाया गया।
धीरे-धीरे ऊधमसिंहनगर पर काबिज हो गए बंग्लादेशी
हल्द्वानी। वर्ष 1971 में बांग्लादेश के कुछ परिवारों को जेलकैंप में जमीन दी गई और फिर धीरे-धीरे गदरपुर, नानकमत्ता, मेलाघाट, पूरनपुर व भोजीपुरा आदि क्षेत्रों में ये परिवार निवास करने लगे। सूत्रों की मानें तो करीब एक साल से बांग्लादेश की खुली सीमा से घुसपैठ कर सैकड़ों परिवार यहां आकर इन क्षेत्रों में बसे विस्थापित परिवारों के बीच रहने लगे हैं। इन बांग्लादेशी परिवारों में से कई लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपने राशन कार्ड, पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि प्रमाण पत्र भी बनवा लिए हैं।
