हल्द्वानी: जंगलों की आग का धुआं पर्यावरण के लिये खतरा

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सर्वेश तिवारी, हल्द्वानी। हर पर धधक रहे कुमाऊं के जंगलों ने पर्यावरण के लिए नया खतरा पैदा कर दिया। मानव का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया और बड़े पैमाने पर वन संपदा खाक हो रही है। जंगली जानवरों की मौत और जंगल की आग से लगातार उठते धुएं ने पर्यावरण में ब्लैक कार्बन की मौजूदगी को …

सर्वेश तिवारी, हल्द्वानी। हर पर धधक रहे कुमाऊं के जंगलों ने पर्यावरण के लिए नया खतरा पैदा कर दिया। मानव का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया और बड़े पैमाने पर वन संपदा खाक हो रही है। जंगली जानवरों की मौत और जंगल की आग से लगातार उठते धुएं ने पर्यावरण में ब्लैक कार्बन की मौजूदगी को अप्रत्याशित तौर पर कई गुना बढ़ा दिया है। पर्यावरण के जानकार इसको बेहद घातक मान रहे हैं।

पहाड़ी इलाकों में जंगल की आग ने बेशकीमती वन संपदा को तो तबाह किया ही है, अब इसका प्रभाव उच्च हिमालयी इलाकों के ग्लेशियरों पर भी पड़ रहा है। आग लगने की घटनाओं के लगातार बढ़ने से हवा की गुणवत्ता खासी खराब हो रही है। हालात यह है कि आम तौर पर जहां पर्यावरण में ब्लैक कार्बन 2 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होता था, वहीं इन दिनों ये 15 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पहुंच गया है।

आग लगने से कार्बन के साथ ओजोन की मात्रा में भी खासा इजाफ हुआ है। अब इसका असर ये हो रहा है कि पहाड़ पर धुएं की वजह से विजिबिलिटी बेहद कम हो गई है। गंगोलीहाट स्थित पताल भुवनेश्वर से हिमालय का बेहतरीन नजारा दिखता है, लेकिन इन दिनों सामने का पहाड़ भी दिखाई नहीं दे रहा है। चारों और फैले धुएं से आंखों में जलन, आंखों में पानी और सांस लेने में परेशानी जैसी तकलीफ आम हो गई है। इसके अलावा ओपीडी में एलर्जी के मरीज भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। बागेश्वर जिला अस्पताल की ओपीडी में जहां पहले छह हजार के करीब मरीज आते थे, वहीं फरवरी में ये आंकड़ा आठ हजार और मार्च में साढ़े आठ हजार हो गया। माना जा रहा है कि अप्रैल में यह आंकड़ा 10 हजार तक पहुंच सकता है।

मिट्टी, पानी, स्रोत और ग्लेशियर भी हो रहे बीमार
हल्द्वानी। पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि छोटे पेड़ और पौधे जल रहे हैं और इससे निकले कार्बन से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। आग पेड़-पौधों, ग्लेशियरों, पेयजल स्रोतों के साथ ही मिट्टी के लिए भी खतरनाक है। एक वास्तविकता यह भी है कि प्रकृति, जीवों और लोगों की सेहत को जो नुकसान हो रहा है, उसका खमियाया लंबे समय तक चुकाना पड़ सकता है।

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