हल्द्वानी: चार मुख्यमंत्री भी विधानसभा की सदस्यता लेने को लड़ चुके हैं उपचुनाव
नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड में विधानसभा की सदस्यता लेने के लिये मुख्यमंत्रियों द्वारा उपचुनाव लड़ने की परंपरा काफी पुरानी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस समय मैदान में हैं तो वहीं इससे पहले चार और मुख्यमंत्री विधानसभा की सदस्यता लेने के लिये उपचुनाव लड़ चुके हैं। राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के …
नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड में विधानसभा की सदस्यता लेने के लिये मुख्यमंत्रियों द्वारा उपचुनाव लड़ने की परंपरा काफी पुरानी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस समय मैदान में हैं तो वहीं इससे पहले चार और मुख्यमंत्री विधानसभा की सदस्यता लेने के लिये उपचुनाव लड़ चुके हैं।
राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जब मुख्यमंत्री बने थे तब वह कांग्रेस से नैनीताल लोकसभा सीट से सांसद थे। विधानसभा की सदस्यता लेने के लिये उन्होंने रामनगर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। और वह जीत गये। इस चुनाव की खासियत यह थे कि पूरे चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री तिवारी ज्यादा सक्रिय नहीं रहे। उन्हें अपनी जीत का भरोसा था। इ
सके बाद भुवन चंद्र खंडूड़ी भाजपा से मुख्यमंत्री बने। वह भी लोकसभा सांसद थे। टीपीएस रावत कांग्रेस के टिकट पर धूमाकोट से विधायक जीतकर आए थे और हरक सिंह भाजपा छोड़कर कांग्रेस के टिकट पर लैंसडौन सीट से जीते थे। टीपीएस और हरक सिंह में विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता पद को लेकर झगड़ा था। पार्टी ने हरक सिंह को नेता चुना।
नाराज टीपीएस ने कांग्रेस छोड़ने के साथ अपनी धूमाकोट सीट से इस्तीफा दे उसे भुवन चंद्र खंडूड़ी के लिए छोड़ दी। हरक के नेता चुने जाने के बाद टीपीएस विधानसभा के हाउस में भी नहीं गए थे। टीपीएस ने बाद में पौड़ी लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और चुनाव जीत गये। इसके बाद इस परंपरा में विजय बहुगुणा शामिल हुये। वह साल 2007 में टिहरी लोकसभा सीट पर हुये उपचुनाव में कांग्रेस से सांसद बने थे। बाद में उन्होंने साल 2009 में भी कांग्रेस के टिकट पर सीट जीती। साल 2012 में जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया तब उन्होंने विधानसभा की सदस्यता के लेने के लिये भाजपा के सितारगंज के विधायक किरन मंडल को कांग्रेस में शामिल करवा लिया।
मंडल ने सीट छोड़ दी और बहुगुणा ने भारी मतों से सितारगंज जीत लिया। इस समय सितारगंज सीट से उनके बेटे सौरभ बहुगुणा विधायक हैं। सौरभ बहुगुणा ने अपने पिता की खाली की हुई टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि वह माला राज्यलक्ष्मी शाह से चुनाव हार गये थे। फिलहाल सौरभ राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं। फिर हरीश रावत मुख्यमंत्री बने। जब वह मुख्यमंत्री बने तब वह हरिद्वार सीट से सांसद थे और साथ ही कांग्रेस की केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी थे। उनके लिये धारचूला विधायक हरीश धामी ने सीट छोड़ी। रावत यहां से विधायक बने। बाद में जब भाजपा ने साल 2021 में तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया था तब भी उनके सामने विधानसभा सदस्यता के लिये उपचुनाव लड़ने की चुनौती थी। हालांकि उससे पहले ही उन्हें हटा दिया गया।
