बरेली: समाज की समस्या से निश्चिंत जनप्रतिनिधि बाहर निकलने से बचते

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बरेली,अमृत विचार। संक्रमणकाल में समाज के अनुभव झकझोरते हैं। लाकडाउन हुए दो महीने से अधिक हो चुके हैं। दैनिक आय पर गुजर करने वाले मेहनतकश वर्ग-मजदूर, रिक्शाचालक, रेहड़ी-पटरी के व्यापारियों बड़े कष्ट सहे। भुखमरी की नौबत पर समाज ने हाथ बढ़ाकर मदद की। मगर जन-प्रतिनिधि समाज की भूख-प्यास, बीमारी, रोजी-रोटी से निश्चिंत होकर क्वारंटीन ही …

बरेली,अमृत विचार। संक्रमणकाल में समाज के अनुभव झकझोरते हैं। लाकडाउन हुए दो महीने से अधिक हो चुके हैं। दैनिक आय पर गुजर करने वाले मेहनतकश वर्ग-मजदूर, रिक्शाचालक, रेहड़ी-पटरी के व्यापारियों बड़े कष्ट सहे। भुखमरी की नौबत पर समाज ने हाथ बढ़ाकर मदद की। मगर जन-प्रतिनिधि समाज की भूख-प्यास, बीमारी, रोजी-रोटी से निश्चिंत होकर क्वारंटीन ही रहे।

अब लाकडाउन में काफी राहत मिल चुकी है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए आवागमन कर सकते हैं। इसके बावजूद भी कई माननीय समाज के बीच सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। शायद वे अभी भी क्वारंटीन हैं। ‘अमृत विचार’ के साथ संवाद में पाठकों ने इस तरह अपनी राय साझा की है।

शहर-कस्बा और गांवों में अलग-अलग तरह की समस्याएं रहीं। गांवों में शहर जैसी भूख-प्यास की तड़प नहीं दिखी। वहां, बाहर फंसे श्रमिकों की वापसी और फसल, उपज की बिक्री से जुड़ी समस्याएं रहीं। कृषक उपेंद्र पटेल बताते हैं कि क्रय केंद्रों पर खूब धांधली हुई। कटौती के नाम पर किसानों को लौटाया जा रहा। मजबूरन वे आढ़तों पर गेहूं बिक्री को विवश हुए। जन-प्रतिनिधि सक्रियता दिखाते हुए किसानों की उपज समर्थन मूल्य पर बिकती। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

वहीं, शहर में निम्न आय वर्ग वालों के सामने दो वक्त की रोजी-रोटी का संकट रहा। सामाजिक संगठन, उद्यमी, चिकित्सक, शिक्षक और युवाओं ने भरपूर मदद की। यहां भी जन-प्रतिनिधियों की सेवाएं नहीं दिखीं।

मीरगंज क्षेत्र के सभी गांव कराए सेनेटाइज: डा. डीसी वर्मा, विधायक, मीरगंज 
मीरगंज क्षेत्र के गांवों में भुखमरी जैसी तनिक भी स्थिति नहीं आई। हम लगातार क्षेत्र पर नजर बनाए रहे। सभी गांवों को सेनेटाइज कराया। मास्क बांटे। फतेहगंज के पास भंडारा चलाकर श्रमिकों तक भोजन-पानी भी वितरित कराया। लाकडाउन के पहले चरण में कुछ दिन जरूर मैं बाहर नहीं निकला। दूसरे चरण मैं लगातार जनसंवाद किया। अपने कार्यालय में लोगों से मिला। उनकी समस्याएं सुनीं और निदान कराया। हां, मैं कभी सोशल मीडिया पर सेवाभाव की तस्वीरें डाले जाने से बचता हूं। हमारे पूरे क्षेत्र में घूम लीजिए। अभी जब आपसे बात कर रहा हूं तो अपने कार्यालय में ही हूं। हमारी टीम गांव-गांव सक्रिय है। हरसंभव मदद पहुंच रही है।

“महामारी काल जैसा संकट शायद भविष्य में कभी नहीं आएगा। इसमें गरीब-मजदूरों की स्थिति दयनीय हो गई। इसमें कुछ जन-प्रतिनिधियों की भूमिका निश्चित रूप से काफी अखरी। उन्हें समाज के बीच खड़े होकर सेवा की मुहिम चलानी चाहिए थी, जो नहीं चलाई गई। समाज ने ही अपने स्तर से एक-दूसरे का सहयोग किया।” -सुमित मिश्रा 

“समाज को जन-प्रतिनिधियों के सहयोग और सक्रियता की अति-आवश्यकता है। उन्हें लोगों के बीच जाकर उन्हें जानकर समाधान कराना चाहिए। गरीबों के पास अभी भी खाने-पीने का संकट है। सरकार राशन दे रही है। उसी सही वितरित ही तो कराना है। पुलिस-प्रशासन, दुकानें खुलने के स्तर के मामलों को गंभीरता से दिखाया जाए, ताकि लोगों का उत्पीड़न न हो।” -विकास शर्मा

“महामारी में विधायकों ने लोगों की समस्याओं से मुंह फेर लिया। यह बड़ा कष्टदायी है। उन्हें आगे बढ़कर लोगों की समस्याएं निस्तारित करनी चाहिए थीं, जो नहीं की। अभी भी जन-प्रतिनिधियों की समाज को आवश्यकता है। अगर वे लोगों के बीच जाएं तो उन्हें समस्याओं का अंदाजा लगेगा। यह समय मिलकर काम करने का है।” -विनोद कुमार, अधिवक्ता

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