बढ़ता व्यापार घाटा
देश का बढ़ता व्यापार घाटा अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इन दिनों अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार मिली-जुली खबरें आ रही हैं। कभी विकास दर में वृद्धि को लेकर खुशी, तो रुपए का और गिर जाना निराशा पैदा करता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त महीने में देश का निर्यात 20 महीनों के …
देश का बढ़ता व्यापार घाटा अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इन दिनों अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार मिली-जुली खबरें आ रही हैं। कभी विकास दर में वृद्धि को लेकर खुशी, तो रुपए का और गिर जाना निराशा पैदा करता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त महीने में देश का निर्यात 20 महीनों के बाद पहली बार 1.15 फीसदी घटकर 33 अरब डॉलर हो गया जबकि देश का आयात एक साल पहले की तुलना में 37 प्रतिशत बढ़कर 61.68 अरब डॉलर हो गया है। इससे व्यापार घाटा दोगुने से भी अधिक बढ़कर 28.68 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। देश के निर्यात में गिरावट ऐसे समय हुई है जब तेल आयात का बिल बढ़ता जा रहा है।
गौरतलब है कि भारत कच्चे तेल की कुल जरूरतों का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है। पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और सोने का आयात एक-तिहाई तक बढ़ा और इसके परिणामस्वरूप व्यापार घाटे में इजाफा हुआ है। इस कैलेंडर वर्ष में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहले ही सात फीसदी तक गिर चुका है और आगे भी इसके दबाव में रहने के आसार हैं। विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा चलन जारी रहने की स्थिति में चालू वित्त वर्ष में आगे भी भारत का व्यापार घाटा मार्च 2023 तक 250 अरब डॉलर के स्तर तक जा सकता है।
आयात-निर्यात संतुलन बिगड़ने के पीछे रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध से तेल और जिसोंं के दाम वैश्विक स्तर पर बढ़ना जैसे प्रमुख कारण हैं। इसकी एक अन्य वजह डीजल और विमान ईंधन के निर्यात पर 1 जुलाई से लगाया गया अप्रत्याशित लाभ कर भी है। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि इससे मुद्रास्फीति और व्यापक आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी। निःसंदेह इस समय जब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण दुनिया में वैश्विक मंदी का परिदृश्य उभर रहा है, तब भारत के विदेश व्यापार घाटे में कमी लाना कोई सरल काम नहीं है। फिर भी भारत को अपना व्यापार घाटा कम करना है। इसके लिए उसे अपने स्तर पर कुछ कदम उठाने होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता आयात विशेषकर पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर अपनी निर्भरता कम करने की जरूरत है। हमें ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। इस दिशा में प्रगति बेशक हो रही है, पर उस गति से नहीं जो कि होनी चाहिए। इसके अलावा निर्यात बढ़ाने के लिए नए बाजार तलाशने होंगे। अगर हम व्यापार घाटे को काबू कर लेते हैं तो अर्थव्यवस्था में मजबूती आएगी, हम अपने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि कर सकेंगे और रोजगार के अतिरिक्त अवसर भी पैदा कर पाएंगे।
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