बरेली: भैंस ने जन्मा आठ पैरों वाला पड्डा, वैज्ञानिकों ने काटकर निकाला
बरेली, अमृत विचार। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में उपचार को आई भैंस ने प्रसव के बाद आठ पैरों वाले पड्डे को जन्म दिया। हालांकि, उपचार से पहले पशु मालिक की ओर से अन्य पशु चिकित्सक को दिखाने से उसकी स्थिति बिगड़ गई। वैज्ञानिकों की ओर से पड्डे को काटकर बाहर निकाला गया। जिसके बाद भैंस की …
बरेली, अमृत विचार। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में उपचार को आई भैंस ने प्रसव के बाद आठ पैरों वाले पड्डे को जन्म दिया। हालांकि, उपचार से पहले पशु मालिक की ओर से अन्य पशु चिकित्सक को दिखाने से उसकी स्थिति बिगड़ गई। वैज्ञानिकों की ओर से पड्डे को काटकर बाहर निकाला गया। जिसके बाद भैंस की स्थिति सामान्य हुई।
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दातागंज के गांव कुंद्रा खसारू निवासी रवि कुमार ने बताया कि उनके पास 15 भैंसें हैं। बुधवार को एक भैंस की प्रसव पीड़ा को देखते हुए गांव के पास ही पशु चिकित्सकों से ही प्रसव के लिए परामर्श लिया। जहां उन्होंने बिना पर्याप्त संसाधनों से ही प्रसव कराने का प्रयास किया। जिससे पड्डे के पिछले दो पैर बाहर आ गए, शेष छह पैर गर्भाशय में ही रह गए।
स्थिति बिगड़ते ही रवि को चिकित्सकों ने आईवीआरआई ले जाने की सलाह दी। जिस पर वे गुरुवार को लेकर पहुंचे। वहां पशु प्रसूति रोग के वैज्ञानिक डा. बृजेश व उनकी टीम की ओर से भैंस का वायटल लेते हुए स्थिति को समझा गया। पड्डे के पैर अंदर होने से स्थिति गंभीर थी। उन्होंने पड्डे के अतिरिक्त पैर काटकर उसे बाहर निकाला। इससे उसकी मौत हो गई।
डिस्टोकिया में प्रसव में लापरवाही से जा सकती है भैंस की जान
डॉ. बृजेश ने बताया कि गाय-भैंस जैसे पशुओं में बच्चे देने में आने वाली इस समस्या को डिस्टोकिया कहा जाता है। इसमें पशु का प्रसव तब कराना होता है, जब उसने गर्भावस्था का कार्यकाल पूरा कर लिया हो, लेकिन पशु बिना सहायता के बच्चे को जन्म देने में सक्षम नहीं होता है। अगर ऐसे में पशुओं के साथ जरा भी लापरवाही बरती जाए तो भ्रूण व पशु दोनों की मौत तक हो सकती है।
आईवीआरआई में सालाना पहुंचते हैं तीन से पांच मामले
आईवीआरआई के रेफरल वेटेनरी पॉलीक्लीनिक में डिस्टोकिया के सालाना तीन से पांच मामले पहुंचते हैं। यहां बरेली व मुरादाबाद मंडल के पशुपालक पशुओं को लेकर आते हैं। डिस्टोकिया के कई कारण हो सकते हैं। इनमें आनुवांशिक, पोषण व रखरखाव, संक्रमण या फिर चोट लगने से भी डिस्टोकिया की समस्या होती है। हर साल असामान्य प्रसव के 250 से अधिक गाय व भैंस के फंसे बच्चे को निकाला जाता है।
डिस्टोकिया के लक्षण
-गर्भवती पशु के अगर पानी की थैली 2 घंटे तक दिखाई देती है और पशु कोशिश नहीं कर रहा है
-पशु के बार-बार उठना- बैठना और चक्कर काटना, लात मारना और पूंछ को घुमाना
डिस्टोकिया के नुकसान
-पशु चिकित्सकों के अनुसार डिस्टोकिया से बच्चे की मौत हो सकती है। वहीं, अगर बच्चा किसी तरह से बचा भी लिया गया तो काफी समय तक सामान्य नहीं रह पाता है। गर्भवती पशु के मरने की संभावना ज्यादा हो जाती है। अगर मां को बचा भी लिया जाए तो दूध की मात्रा कम रहती है। गर्भाशय में संक्रमण होने और प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है।
प्रसूति निवारण की समस्या (डिस्टोकिया) का निदान आईवीआरआई के रेफरल वेटेनरी पॉलीक्लीनिक में 24 घंटे किया जाता है। पशुपालकों से अपील है कि इस तरह की गंभीर स्थिति पर बिना देर किए आईवीआरआई में परामर्श व उपचार के लिए पहुंचे। वहीं, आईवीआरआई की ओर से लगातार पशुओं को बेहतर उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जाने का प्रयास किया जा रहा है।-डॉ. त्रिवेणी दत्त, निदेशक, आईवीआरआई
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