मैनपुरी उपचुनाव: नेताजी की गैरमौजूदगी में अखिलेश की पहली ‘अग्निपरीक्षा’
खासकर मैनपुरी लोकसभा और रामपुर विधानसभा उपचुनाव सपा प्रमुख के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं
यादव कुनबे को साथ लेकर चलने के साथ पिता की राजनीतिक विरासत बचाना अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
लखनऊ। समाजवादी पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव की मृत्यु के मात्र 55 दिन बाद ही बेटे अखिलेश यादव को ‘अग्निपरीक्षा’ देनी होगी। मैनपुरी लोकसभा और रामपुर व खतौली विधानसभा सीटों के लिए 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव सपा प्रमुख अखिलेश के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं। इस दौरान उन्हें दो चुनौतियों से पार पाना है। एक तो चुनाव में यादव कुनबा एकजुट रहे और दूसरा ‘नेताजी’ (मुलायम) की राजनीतिक विरासत को आंच न आने पाए।
मैनपुरी की लोकसभा सीट मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई है। वहीं दूसरी तरफ रामपुर की विधानसभा सीट पर आजम खान की सदस्यता जाने के बाद उपचुनाव होना हैं। पहली बार अखिलेश किसी चुनावी मोर्चे पर पिता के निधन के बाद उतरेंगे। ऐसे में उनके सामने कई अहम चुनौतियां होंगी। सवाल बड़ा यह है कि क्या आजमगढ़ की लोकसभा सीट के रूप में सपा का एक गढ़ गंवाने के बाद अखिलेश, मैनपुरी और रामपुर के किले की हिफाजत कर पाएंगे?
मैनपुरी और रामपुर की सीटें सपा के लिए बहुत ही ज्यादा मायने रखती हैं। पिता के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी सीट पर तो अखिलेश की अपनी भी प्रतिष्ठा दांव पर है। मैनपुरी में लोकसभा का उपचुनाव जीतकर वह ‘नेताजी’ को एक सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहेंगे। संभवत: यही वजह है कि रिस्क न लेते हुए उन्होंने यहां परिवार की बहु और अपनी पत्नी डिंपल को ही उम्मीदवार बनाया हैं।
चुनाव के दौरान सुरक्षित कदम बढ़ाते हुए अखिलेश ने चाचा शिवपाल की भी नाराजगी लेने का रिस्क नहीं लिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि डिंपल को उम्मीदवार बनाने का फैसला चाचा से पूछ कर लिया गया है। यहां तक कि शिवपाल को उन्होंने यहां अपना स्टार प्रचारक भी बनाया है। दरअसल, ओवरकॉन्फिडेंस और व्यक्तिगत खींचतान में सपा राजनीतिकतौर पर सुरक्षित समझे जाने वाली अपनी दो लोकसभा सीट को भाजपा के हाथों गंवा चुकी है। याद हो कि आजमगढ़ के उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार दिनेश लाल यादव निरहुआ ने सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र सिंह को पराजित किया था। रोचक तथ्य तो यह है कि बीते विधानसभा चुनाव के बाद आजमगढ़ की सीट अखिलेश यादव के ही इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी।
रही बात रामपुर की तो यहां की विधानसभा सीट से सपा नेता आजम खान 10 बार विधायक चुने गए। 1996 के बाद समाजवादी कभी भी इस सीट पर नहीं हारी है। यहां तक कि साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर में भी रामपुर से आजम खान जीत हासिल करने में भाजपा कामयाब न रही। यहां तक कि साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में आजम खान ने सांसद बनने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दिया और पत्नी डॉ. तजीन फात्मा को चुनाव लड़वाकर यह सीट जाने नहीं दी।
हालांकि बीते विधानसभा चुनाव में विधायक बनने बाद जब आजम ने सांसद पद छोड़ा तो रामपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा सेंधमारी करने में सफल रही। रामपुर में सपा को भाजपा के हाथों शिकस्त मिली थी। तब सपा ने यहां पर आजम की पसंद आसिम रजा को टिकट दिया था और भाजपा उम्मीदवार घनश्याम लोधी ने उन्हें 42 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी।
बहरहाल, वर्तमान में सपा मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव और रामपुर विधानसभा उपचुनाव को जीतने की रणनीति में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। इसीलिए मैनपुरी से जहां मुलायम की राजनीतिक विरासत संभालने का जिम्मा अखिलेश ने बहु डिम्पल को सौंपा वहीं इस बार भी सपा आजम की पसंद से आसिम रजा को ही फिर उम्मीदवार चुना है। सपा की मंशा इन जिताऊ कैंडिडेट से चुनावी बाजी जीतकर मुलायम को सच्ची श्रद्धांजलि देने की है।
