हल्द्वानी: बनभूलपुरा अतिक्रमण - आंखों में आंसू और लबों में गुहार...देखें कैमरे की नजर से पूरा हाल
भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। दिन 28 दिसंबर 2022, बुधवार, कड़ाके ठंड के बीच छोटे बच्चे,बुजुर्ग, महिलाएं और युवा बनभूलपुरा थाने के सामने इकट्ठा थे, समय यही कोई 9 बज रहा होगा, चारों ओर गहमागहमी का महौल नजर आ रहा था, भारी पुलिस बल तैनात जिसने पूरा बनभूलपुरा एरिया को बैरिकेड लगाकर सील किया हुआ था..गौलापार से आने वाले वाहनों की पुलिस वालों से झड़प और एक लंबा रास्ता तय कर वे लोग शहर यानी हल्द्वानी में दाखिल हो रहे थे।
शहर में आज भीड़-भाड़ भी नहीं थी न कोई जाम का झाम, पूरा प्रशासनिक अमला जुटा था तो बनभूलपुरा इलाके में...दरअसल आज रेलवे की अतिक्रमित भूमि सीमांकन का सर्वे था, जी हां सही समझे आप वही रेलवे का अतिक्रमण का मामला...आपको पता ही है..
सबसे पहले गफूर बस्ती और ढोलक बस्ती की बात करें तो हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से सटे इस बस्ती के लोगों का डेरा आज बस्ती के बाहर मैदान में दरी बिछाकर बैठा था, छोटे बच्चों के साथ महिलाएं ठंड में गुनगुनी धूप में टकटकी लगाए हाथ में डंडा लिए पुलिस वालों को निहार रहीं थीं, कभी नारे लगाते तो कभी मीडिया कर्मियों को देखकर उनके पास आकर सवाल पूछते क्या आज हमारी बस्ती उजाड़ी जाएगी...वहीं हूटर बजाती सरकारी वाहनों को देखकर बच्चे एक दम सहम से जाते..प्रशासनिक अमला करीब से गुजरा तो हाथ जोड़ सभी कहते अरे साहब इस ठंड में कहां जाएंगे..चले भी जाएं पर कहीं जगह तो दे दो..मगर अधिकारी बिना सवाल का जवाब दिए आगे बढ़ जाते हैं और वे फिर आपस में यही बतियाते अरे अब कोई फायदा नहीं...ये साहिब लोग अब कुछ नहीं सुनने वाले अब तो ऊपर वाला ही जाने क्या होवे गा...
खैर यहां से चंद कदमों की दूरी पर चलने के बाद..कुछ दूरी पर गली पर नमाज पढ़ते लोग नजर आते हैं...नमाज अदा करने के बाद एक बुजुर्ग दूसरे बुजुर्ग से कहते नजर आए अब मसला सुलझता नजर नहीं आरिया..अब तो लगरिया है कि बस....तभी युवाओं की टोली नजर आई जो ठीक बनभूलपुरा थाने के सामने चारों ओर घेरा लगाए खड़ी थी एक पल को लगा शायद कोई बवाल हो गया हो पर पास पहुंचकर देखा तो मामला सामान्य था थानाध्यक्ष लोगों को समझा रहे थे और लोग भी शांति के साथ मौके पर खड़े रहे..छोटे बच्चे हाथों में बैनर लेकर खड़े थे तो वहीं लाइन नंबर सत्रह में बुजुर्ग महिलाएं कुरान पड़ ऊपर वाले से बस यही दुआएं मांग रहीं थीं कि अब तेरे फैसले का इंतजार है तू भी अपना फैसला सुना दे और हो सके तो हमारी अर्जी सुन ले मौला...
खैर इन सब के बीच प्रशासन के नुमाइंदों सहित नेताओं के बीच चर्चाओं का दौर चलता रहा और सर्वे का कार्य पूरी शांति व्यवस्था के साथ पूरा कर लिया गया और शाम होते-होते पूरी तरह भीड़ छंट तो गई पर हर गली और नुक्कड़ में चर्चाओं का दौर चलता रहा और कयास लगते रहे।अब ये दुआ क्या रंग लाती है...क्या बस्ती बच पाएगी...क्या लोगों के आशियाने उजड़ने से बच पाएंगे इन सवालों का जवाब हर कोई ढूंढ रहा है जिसमें आप भी शामिल हैं और हम भी...खैर इस पूरे मामले में एक शेर याद आ गया कि... इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो ... मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो ।
