विपक्षी एकता
अडाणी ग्रुप के विरुद्ध आरोपों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की मांग पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अध्यक्ष शरद पवार का अलग रुख राजनीतिक नजरिए से काफी महत्वपूर्ण है। इससे मिशन 2024 में विपक्षी एकता की मुहिम को झटका लगा है। पिछले दिनों राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता रद किए जाने के बाद कांग्रेस से दूरी बनाकर चलने वाली बीआरएस, टीएमसी और आप जैसी विपक्षी पार्टियां भी खुलकर उनके समर्थन में खड़ी नजर आईं। इसे विपक्षी एकता की पहली बाधा पार करने के तौर पर देखा गया।
दरअसल लोकसभा चुनाव 2024 जैसे-जैसे निकट आ रहे हैं, विपक्ष की एकजुटता की कवायद तेज होने के साथ-साथ इस पर सवाल भी उठते जा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ने कहा है कि यह पवार का अपना विचार हो सकता है। शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि पवार ने कोई क्लीनचिट नहीं दी है, बल्कि इस बात पर अपनी राय प्रकट की है कि जांच कैसे की जाए। 2023 में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनाव हो चुके हैं। कर्नाटक, मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव होने हैं। फिलहाल पूर्वोत्तर के राज्यों के चुनाव परिणामों से साफ हो गया कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने राज्यों में भी अपने बलबूते सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पा रहीं। उधर राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने रविवार को सीएम अशोक गहलोत के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल दिया।
राज्य में भाजपा शासन के दौरान कथित भ्रष्टाचार को लेकर अपनी सरकार से कार्रवाई की मांग के लिए एक दिन का उपवास करने की घोषणा की। पायलट ने कहा कि वह अपनी मांग को लेकर दबाव बनाने के लिए 11 अप्रैल को शहीद स्मारक पर एक दिन का उपवास रखेंगे। ऐसे समय में जब कांग्रेस सरकार आगामी चुनावों में राज्य में सत्ता बरकरार रखने और देश में विपक्षी एकता के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है, पायलट की अनशन पर बैठने की घोषणा निश्चित रूप से जनता के बीच गलत संदेश देगी। पायलट की घोषणा भी गहलोत के खिलाफ एक तरह की बगावत है और इससे निश्चित तौर पर पार्टी को नुकसान होगा। लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना इसकी सफलता की गारंटी माना जाता है। यह बात स्वयं सत्ताधारी पार्टी भाजपा के नेता भी कहते रहते हैं और यह तभी संभव हो पाएगा जब विभिन्न दलों के नेता अपने व्यक्तिगत हितों को तिलांजली दें।
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