कानपुर : सिर पर लोकसभा चुनाव और अस्तित्व की छटपटाहट में कांग्रेस
कानपुर, अमृत विचार। निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी से पिछड़कर तीसरे नंबर पर पहुंची कानपुर में कांग्रेस हतोत्साहित है। लोकसभा चुनाव की चुनौती उसके बस की बात नहीं लगती। यदि भाजपा विरोधी मोर्चा के लिए सपा और कांग्रेस में गठजोड़ हो भी जाता है तो भी कानपुर लोकसभा सीट पर संयुक्त मोर्चा की तरफ सपा अपना प्रत्याशी उतारने का दावा करेगी। सपा के अंदरूनी सूत्र ऐसा कहते भी हैं। कर्नाटक के चुनाव में जीत का परचम फहराने वाली कांग्रेस कानपुर से लोकसभा प्रत्याशी उतारने के मामले में अब काफी सोच-विचार करेगी। यहां पर उसे सपा से ही झटका मिला है। मेयर चुनाव में विजय के कारण उत्साहित भाजपा को लगता है कि कानपुर में अब उसे किसी भी दल से चुनौती मिलती नहीं दिख रही है।
मेयर के चुनाव में सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं जबकि लोकसभा क्षेत्र में पांच। महाराजपुर और कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र कानपुर संसदीय क्षेत्र से कट जाते हैं। कुल 90 हजार वोट पाकर जमानत गवां देने वाली कांग्रेस अब अपने नेतृत्व से किस मुंह से टिकट मांगेगी यह तो दावेदार ही बता सकते हैं पर चुनाव आते-आते पार्टी को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। कांग्रेस उम्मीदवार 13 वार्डों में दूसरे स्थान पर रहे। 22 वार्डों में तीसरे नंबर पर रहे। जनरल गंज में कांग्रेस को सबसे कम 96 और सबसे ज्यादा 4779 वोट गोविंद नगर दक्षिणी इलाके में मिले हैं।
विधानसभा चुनाव में परिणाम कुछ भी आते रहे हों लेकिन निकाय और लोकसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से ही हमेशा चुनौती मिलती रही। अबकी निकाय चुनाव में समीकरण गड़बड़ हो गया तो इसके पीछे कांग्रेस नेतृत्व ही जिम्मेदार माना जा रहा है। खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रत्याशी दमदार होता तो परिणाम भी कुछ इतर हो सकते थे। कम से कम जीत-हार का अंतर कम होता जो लोकसभा चुनाव में टिकट के दावे का मजबूत आधार बनता। अबकी के परिणाम कांग्रेस की चिंता बढ़ाने वाले हैं। वैसे तो मेयर पद पर इस बार 13 उम्मीदवार लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन कांग्रेस समेत 11 प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाए। यह लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए बड़ी खतरे की घंटी मानते हैं।
कांग्रेस के लोग आशनी अवस्थी की टिकट पर कहते हैं कि प्रियंका गांधी के नाम पर जिस तरह टिकट लीं गयी थी तो उससे लगता था प्रियंका प्रचार को आ सकती हैं। पार्टी से आर्थिक मदद मिलेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। वह पूरे चुनाव में कर्नाटक में व्यस्त थी। यह कानपुर में कांग्रेस का सबसे बुरा दौर है। सिमटते आधार में उसके अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है। 1999 से लेकर 2014 तक श्रीप्रकाश जायसवाल के रूप में कांग्रेस के टिकट पर सांसद लोकसभा पहुंचाया जाता रहा। वह दस साल तक यूपीए सरकार में मंत्री भी रहे। अब तो बेड़ा पार करने की चुनौती है। कानपुर में पिछले पांच सालों में कांग्रेस का 21 प्रतिशत जनाधार घटा है। साल 2017 में कांग्रेस को 31 प्रतिशत वोट मिला था। इस बार 10 प्रतिशत ही रह गया।
भाजपा को टक्कर देने वाली कांग्रेस का यह हाल होगा, ऐसा पार्टी के नेताओं ने सोचा भी न होगा। पार्षद चुनाव में बागियों ने भी परेशान किया जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्षदों की संख्या 18 से घटकर 13 ही रह गयी। कई वार्डों में तो कांग्रेस ही कांग्रेस को हराते हुए दिखी। यही नहीं मुसलमान भी कांग्रेस से छिटक गया। अंदरूनी खींचतान और बगावत का नतीजा यह हुआ कि ब्राह्मण वोट और मुस्लिम वोट बैंक के साथ आने पर हमेशा दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस इस बार तीसरे नंबर पर हो गई और अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी।
कांग्रेस के पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्रा कहते हैं कि नेतृत्व न जाने क्या सोचकर नगर निगम के चुनाव में मेयर प्रत्याशी को उतारा। कद्दावर ब्राह्मण महिला नेता को यह मौका दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और हो सकता था। इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया गया। टिकट दिया था तो नेतृत्व को रुचि भी लेनी चाहिए थी। व्यापारी क्षेत्र में काम करने वाली सपा नेत्री अपर्णा जैन का कहना है कि कांग्रेस की कमजोरी का लाभ सपा को भरपूर मिला है। लोकसभा चुनाव में सपा पूरे दलबल के साथ मैदान में उतरेगी। उनका दावा है कि समाज के सभी वर्ग के मतदाता लोकसभा चुनाव में सपा के साथ खड़े मिलेंगे। मेयर के चुनाव में मिले वोट लोकसभा चुनाव में काफी कारगर साबित होंगे। आम आदमी पार्टी से मेयर प्रत्याशी रहीं इस्मा जहीर ने कहा कि भाजपा को रोकने के लिए समान विचारधारा वाले दलों को एक मंच पर आना चाहिए। निकाय चुनाव का तजुर्बा लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के काम आएगा। आप जनता के बीच दिखती थी दिखती रहेगी।
भाजपा नेता पूर्व पार्षद निर्मल मिश्रा के अनुसार चाहे जितने कर लो गठजोड़, कहां से लाओगे योगी का तोड़। मोदी-योगी सरकार जनता की कसौटी पर खरी उतर रही है। इसीलिए लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा के सामने कोई दल नहीं टिक पाएगा।
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